No Confidence Motion: मणिपुर हिंसा के मामले पर आज विपक्ष ने संसद के मानसून सत्र में मोदी सरकार का विरोध तेज कर दिया है। इसके चलते आज संसद सदन में विपक्ष केंद्र सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ला रहा है। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में भी वर्ष 2018 में भी विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव लाया था। उस समय 11 घंटे तक बहस चली थी। प्रस्ताव के बाद पीएम मोदी का जवाब भी बहुत चर्चित हुआ था। वोटिंग के बाद मोदी सरकार ने वहां बहुमत साबित कर दिया था। अब फिर से यह सब चर्चाओं में हैं। आइये समझते हैं किअविश्वास प्रस्ताव आखिर क्या होता है, इसके क्या नियम हैं, यह किन परिस्थितयों में लाया जा सकता है और इससे जुड़े अभी तक के कुछ इतिहास के तथ्य।
लोकसभा में अगर किसी भी प्रतिपक्ष की पार्टी को ऐसा लगता है कि सत्तारूढ़ दल या सरकार सदन में अपना विश्वास खो चुकी है और देश में सरकार की नीतियां ठीक नहीं हैं तो ऐसे में यह अविश्वास प्रस्ताव लाया जाता है। इसे नो कांफिडेंस मोशन कहा जाता है। विपक्ष यह दावा करता है कि सरकार के पास बहुमत नहीं है, ऐसे में सरकार को इसे साबित भी करना होता है। इस प्रस्ताव का प्रावधान संविधान के आर्टिकल 75 में किया गया है। इसके अनुसार सदन में मेजॉरिटी साबित न करने पर प्रधानमंत्री सहित कैबिनेट को त्याग पत्र देना होता है।
लोकसभा में जब अवश्विास प्रस्ताव लाया जाता है तब सत्तारूढ़ दल को स्वयं का संख्या बल साबित करना होता है लेकिन इसके लिए मतदान की पात्रता केवल लोकसभा सांसदों को ही होती है। राज्यसभा के सांसद इस मतदान में हिस्सा नहीं ले सकते। अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान के समय सरकार अपने सांसदों के लिए व्हिप जारी अवश्य कर सकती है। जो सांसद इसका समर्थन नहीं करेगा, उसे अयोग्य माना जा सकता है। इसका एक नियम और है कि सदन में मौजूद सदस्यों में से आधे से एक अधिक सदस्य ने भी यदि सरकार के विरुद्ध मतदान कर दिया तो सरकार गिर सकती है।
लोकसभा के इतिहास में अभी कुल 27 बार अविश्वास प्रस्ताव लाया जा चुका है। मोदी सरकार के पिछले कार्यकाल में जुलाई 2028 में विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव लाया था, जिसमें विपक्ष को बुरी तरह मुंह की खाना पड़ी थी। उस समय प्रस्ताव लाने वाले राहुल गांधी के समर्थन में केवल 126 वोट पड़े थे जब 325 सांसदों ने इसके खिलाफ वोट किया था। अब मणिपुर मामले को लेकर लाए जाने वाले प्रस्ताव को मिलाकर इनकी संख्या 28 हो जाएगी। इससे पहले वर्ष 2003 में सोनिया गांधी की अगुवाई में कांग्रेस ने अटल नीत तत्कालीन एनडीए राजग सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था।
लोकसभा में सबसे पहले वर्ष 1963 में अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था। तत्कालीन सपा नेता आचार्य कृपलानी तत्कालीन नेहरू की सरकार के खिलाफ यह प्रस्ताव लाए थे। हालांकि उनका प्रस्ताव 347 वोटों के साथ गिर गया और नेहरू की सत्ता कायम रही। प्रस्ताव के पक्ष में केवल 62 वोट पड़े थे और विरोध में 327 वोट।
लोकसभा में अभी तक सबसे अधिक बार इंदिरा गांधी की सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया जा चुका है। इनकी संख्या 15 है। इसके बाद लाल बहादुर शास्त्री, पीवी नरसिंह राव के खिलाफ भी तीन-तीन बार प्रस्ताव लाया जा चुका है। अटल नीत सरकार के खिलाफ भी दो बार प्रस्ताव लाया गया था। राजीव गांधी, वीपी सिंह, चौधरी चरण सिंह, मनमोहन सिंह व नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ भी एक-एक बार यह प्रस्ताव पेश किया जा चुका है।
लोकसभा के इतिहास में अविश्वास प्रस्ताव 27 बार लाया गया है लेकिन इससे सरकारें केवल तीन ही बार गिरी हैं। पहली बार 1990 में वीपी सिंह, दूसरी बार 1997 में एचडी दैवेगोड़ा एवं 1999 में अटल सरकार के खिलाफ यह प्रस्ताव पारित हो गया था।
आज 26 जुलाई 2023 को विपक्ष मोदी सरकार के खिलाफ अवश्विास प्रस्ताव लेकर आया है। हालांकि इस समय लोकसभा में मोदी सरकार की स्थिति मजबूत है। इसलिए यह अनुमान है कि सरकार विश्वास मत यानी ट्रस्ट वोट हासिल कर लेगी। वर्तमान में भाजपा के पास 301 व समस्त राजग के पास 333 सांसद हैं। विपक्ष के पास कुल 142 सांसद हैं। इनमें से 50 सांसद कांग्रेस के हैं।
लोकसभा के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियमवाली के नियम 198(1) से 198(5) तक अविश्वास प्रस्ताव का उल्लेख है। यह प्रस्ताव महज एक लाइन का है। इसमें कहा गया है कि 'यह सदन मंत्रिपरिषद में अविश्वास व्यक्त करता है'
नियम 198(1)(क): इस नियम के अंतर्गत जो भी कोई सदस्य अविश्वास लाना चाहता है वह सभापति के बुलाने पर सदन से अनुमति मांगता है।
नियम 198(1)(ख): सदस्य को अविश्वास प्रस्ताव की लिखित सूचना सुबह 10 बजे तक लोकसभा सचिव को देना होती है।
नियम 198(2): जब भी अविश्वास प्रस्ताव लाया जाए तब इसके पक्ष में कम से कम 50 सदस्यों का समर्थन होना चाहिए अन्यथा स्पीकर इसकी अनुमति नहीं दे सकते।
नियम 198(3): जब स्पीकर से अनुमति मिल जाए तब प्रस्ताव पर चर्चा के लिये एक या अधिक दिन तय कर लिया जाता है।
नियम 198(4): जब अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा का अंतिम दिन होता है तब स्पीकर सदन में वोटिंग कराते हैं और बहुमत संबंधी परिणाम की घोषणा करते हैं।