Rani Durgavati Death Anniversary: वीरांगना रानी दुर्गावती के बलिदान दिवस पर मध्य प्रदेश के अलग-अलग शहरों से 'रानी दुर्गावती गौरव यात्रा' निकाली जा रही है। इन यात्राओं का समापन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 27 जून को शहडोल में करेंगे। आइये आपको सुनाते हैं मध्य प्रदेश की इस वीरांगना रानी की कहानी, जिसने मुगल बादशाह अकबर के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत दिखाई और उसकी सेना के छक्के छुड़ा दिये। मुगलों के इतिहास में इस रानी की वीरता का भी सम्मान से जिक्र होता है।
साल 1524 में उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में राजा कीर्तिसिंह चंदेल के घर दुर्गावती का जन्म हुआ था। ये दुर्गा अष्टमी का दिन था, इसलिए उनका नाम दुर्गावती रखा गया। वो अपने पिता की इकलौती संतान थीं और उन्होंने बचपन से ही घुड़सवारी, तलवारबाजी, तीरंदाजी जैसी युद्ध कलाओं की शिक्षा ली थी। अकबरनामा में भी रानी दुर्गावती का जिक्र है जिसमें कहा गया है कि वो तीर और बंदूक चलाने में माहिर थीं।
15वीं सदी में मुगल बादशाह अकबर का राज पूरे भारत में तेजी से फैल रहा था। अकबर ने कई हिंदू राजाओं के साथ संधि कर अपना साम्राज्य बढ़ा लिया था। लेकिन जिन हिंदू राज्यों ने संधि से इनकार किया, उन्हें मुगल सेना का सामना करना पड़ रहा था। ऐसा ही एक राज्य था गोंडवाना जिसने अकबर के सामने झुकने से इनकार कर दिया। मगलों को चुनौती देनेवाले इस गोंडवानी की रानी थी दुर्गावती।
रानी दुर्गावती की शादी 18 साल की उम्र में उनका ब्याह गोंड राजवंश के राजा संग्राम शाह के बड़े बेटे दलपत शाह से हो गई। उस वक्त गोंड वंशज का 4 राज्यों पर राज करते थे- गढ़-मंडला, देवगढ़, चंदा और खेरला। दलपत शाह का आधिपत्य गढ़-मंडला पर था। ये पहली बार था जब किसी राजपूत राजकुमारी का गोंड वंश में विवाह हुआ था। 1545 में उनके बेटे वीर नारायण का जन्म हुआ, लेकिन 1550 में उनके पति का निधन हो गया। 5 साल के राजकुमार को सिंहासन पर बैठाकर रानी ने राजकाज का जिम्मा संभाल लिया। इस दौरान उन्होंने अनेक मठ, बावड़ियां, कुंए और धर्मशालाएं बनवाईं। उन्होंने अपने नाम पर रानीताल, दीवान आधार सिंह के नाम पर आधारताल और अपनी दासी के नाम पर चेरीताल भी बनवाया था।
शांति के कुछ ही साल बीते थे कि 1556 में मालवा के सुल्तान बाज बहादुर ने हमला कर दिया। लेकिन दुर्गावती ने उसे धूल चटा दी। 1562 में जब अकबर ने मालवा को मुगल साम्राज्य में मिला लिया, तो उसकी नजर गोंडवाना पर पड़ी। 1564 में मुगल सेनापति आसफ खान ने गोंडवाना पर हमला बोल दिया। छोटी सेना रहते हुए भी दुर्गावती ने मोर्चा संभाला और दुश्मनों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। अगले दिन मुगलों की सेना, अपनी हार का बदला लेने के लिए और अधिक सैनिकों के साथ पहुंच गई। तब तक रानी के पास सिर्फ 300 ही सैनिक शेष थे, लेकिन उन्होंने पूरी बहादुरी से मुकाबला किया।
रानी ने हार नजदीक देख, दीवान आधार सिंह को अपनी जान लेने को कहा। वो ऐसा नहीं कर पाए तो उन्होंने खुद ही अपने सीने में कटार उतार ली। 24 जून 1564 को उन्होंने अंतिम सांस ली। लेकिन उनके बेटे ने युद्ध लड़ना जारी रखा और वे भी वीरगति को प्राप्त हुए। उनके सम्मान में भारत सरकार ने साल 1988 में रानी दुर्गावती के नाम एक पोस्टल स्टाम्प भी जारी किया।