
इलाहाबाद। जस्टिस सुधीर अग्रवाल ने आगरा यूनिवर्सिटी से कला में स्नातक करने के बाद 1980 में मेरठ विश्वविद्यालय से अपनी वकालत पूरी की। वर्ष 1980 में उन्होंने टैक्स संबंधी मामलों को लेकर वकालत की शुरुआत की थी, लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में लोक सेवा से जुड़े मामलों को लेकर अपनी वकालत जारी रखी। उनका जन्म 24 अप्रैल 1958 को हुआ था।
वर्ष 2003 में उन्हें उच्च न्यायालय में बतौर उत्तर प्रदेश सरकार के अतिरिक्त अधिवक्ता नियुक्त किया गया। अप्रैल, 2004 में वह वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में पदोन्नत हुए। अक्टूबर, 2005 में उन्हें अतिरिक्त न्यायाधीश के रुप में पदोन्नत किया गया और वर्ष 2007 में उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के स्थाई जज के रुप में शपथ ली। वह 23 अप्रैल 2020 को रिटायर होंगे।
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जस्टिस अग्रवाल इससे पहले भी कुछ कड़े फैसले दे चुके हैं। वह अयोध्या मामले की सुनवाई से भी जुड़े रहे हैं। उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति पर नाराजगी जाहिर करते हुए 10 जुलाई 2015 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से गहरी नींद से जागने और ऐसे कदम उठाने को कहा। ताकि पुलिस बल को ज्यादा सक्रिय और जनोन्मुखी बनाया जा सके।
एक आदेश में न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल और न्यायमूर्ति शशिकांत ने मुख्य सचिव, प्रधान सचिव (गृह) और सचिव (नियुक्ति) को निर्देश दिया कि वे उचित कदम उठाएं और योजनाओं को अंतिम रूप दें ताकि उत्तर प्रदेश पुलिस को वास्तव में कानून-व्यवस्था का पालन कराने
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वाली एक मशीनरी बनाई जा सके और जो लोगों के लिए काम करती दिखे और उसमें लोगों का भरोसा बहाल हो सके। उन्होंने जुलाई 2013 में एक रिटायर कर्मचारी की याचिका पर इलाहाबाद के जिला जज पर पांच हजार रुपए का हर्जाना लगाया था। जस्टिस अग्रवाल ने यह फैसला सुनाते हुए कहा था कि लोकसेवकों को तानाशाही के व्यवहार की इजाजत नहीं दी जा सकती।
अदालत ने कहा, किसी भी अधिकारी या कर्मचारी को सेवानिवृत्त कर्मचारी का भुगतान बिना किसी कारण रोकने का अधिकार नहीं है। ऐसा करना सरकारी मशीनरी का आम आदमी का शोषण करना है। जस्टिस सुधीर अग्रवाल ने यह आदेश डिस्ट्रक्ट कोर्ट से रिटायर हुए एमपी श्रीवास्तव की याचिका पर दिया है। याची इलाहाबाद में कार्यरत थे।