अभी भी जेल की चारदीवारी में कैद है राम प्रसाद बिस्मिल का स्मारक
19 दिसंबर को बलिदान दिवस के रूप में मनाते हैं।
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Publish Date: Wed, 19 Dec 2018 02:45:03 PM (IST)
Updated Date: Wed, 19 Dec 2018 02:51:16 PM (IST)

महान क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां और रोशन सिंह को साल 19 दिसंबर, 1927 को फांसी पर चढ़ा दिया गया था। इस दिन को हम बलिदान दिवस के रूप में मनाते हैं। इन लोगों ने देश को आजाद कराने में क्रांतिकारियों की मदद के लिए काकोरी में एक ट्रेन के खजाने को लूटा था। इसे हम लोग काकोरी कांड के नाम से जानते हैं। इसी आरोप में तीनों को अंग्रेजों ने फांसी पर चढ़ा दिया था।
आजादी की लड़ाई के दौरान चर्चित काकोरी कांड में राम प्रसाद बिस्मिल को जब गोरखपुर जेल में फांसी के फंदे चढाने के लिए लाया गया था तब उन्होंने फांसी के तख्ते पर खडे होकर कहा था 'मैं ब्रिटिश साम्राज्य का पतन चाहता हूं।' उसके वाद एक शेर कहा - 'अब न अह्ले-वल्वले हैं और न अरमानों की भीड़, एक मिट जाने की हसरत अब दिले-बिस्मिल में है!'
इसके बाद फांसी की रस्सी खींची और रामप्रसाद बिस्मिल फाँसी पर लटक गये। इसके बाद देश में आजादी का आंदोलन तेज हुआ, क्रांतिकारियों का संघर्ष रंग लाया और देश आजाद हुआ। लेकिन राम प्रसाद बिस्मिल आजाद भारत में गोरखपुर के जेल से अभी भी आजाद नहीं हो पाए। यह बात है गोरखपुर जेल के उस स्मृति स्थल की जहां बिस्मिल को फांसी दी गई थी, वहां आम पब्लिक नहीं जा सकती है। यह जेल की चाहरदिवारी में ही कैद है। अब इसे पब्लिक के लिए सहज आवागमन के लिए आवाज उठने लगी है। कई संगठन यह मांग करने लगे हैं कि इस ऐतिहासिक स्थान को आम आदमी के लिए आ