
बीजिंग। अपने पुनर्जन्म के बारे में फैसला लेने में तिब्बत के निर्वासित आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा सक्षम हैं। उन्हें खुद तय करना है कि वे अगला जन्म चाहते हैं या नहीं। यह बात बौद्ध धर्म के तीसरे सबसे बड़े नेता उग्येन त्रिनले दोरजी ने कही है। करमापा लामा की उपाधि प्राप्त दोरजी का यह बयान चीनी अधिकारियों के लगातार आ रहे इन बयानों के बाद आया है कि दलाई लामा को स्वयं यह तय करने का अधिकार नहीं है।
वाशिंगटन में रेडियो फ्री एशिया को दिए साक्षात्कार में दोरजे ने कहा कि तिब्बत की परंपरा के अनुसार जीवित गुरु के पुनर्जन्म के बारे में ज्यादा बात करना उचित नहीं है। इस संबंध में कई सवाल उठ रहे हैं, लेकिन मेरा मानना है कि दलाई लामा को अपने भविष्य का निर्णय खुद ही करना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस संबंध में जारी बयानबाजी और अटकलों से मैं चिंतित नहीं हूं। करमापा के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता होंग ली ने कहा है कि पुनर्जन्म की परंपरा सदियों पुरानी है और इसका सम्मान किया जाना चाहिए।
कौन हैं दोरजे?
करमापा लामा दोरजे 2000 में तिब्बत से भारत आए थे। उन्हें दलाई लामा का करीबी सहयोगी माना जाता है। उनके तिब्बत छोड़न के बाद भी चीन उन्हें 17वां आध्यात्मिक अवतार मानता है।
विवाद क्यों?
दलाई लामा ने पिछले साल कहा था कि यह उपाधि पाने वाले वे आखिरी व्यक्ति हो सकते हैं। दूसरी ओर, चीन परंपरा जारी रखने पर जोर दे रहा है। आशंका है कि चीन किसी ऐसी व्यक्ति को दलाई लामा का अवतार चुना सकता है जो उसके प्रभाव में हो। नोबेल शांति पुरस्कार विजेता दलाई लामा 1959 में उस समय भागकर भारत आ गए थे जब तिब्बत में विद्रोह की कोशिश को चीन ने दबा दिया था।