
नरसिंहपुर। स्वतंत्रता के लिए संघर्ष में नरसिंहपुर जिले का युवा वर्ग भी शांत न बैठ सका, जगह-जगह उनके संगठन तैयार हो गए। इसी शहर में एक संपन्ना कृषक राजपूत परिवार में ठा. रुद्रप्रताप सिंह का जन्म हुआ। ठाकुर परिवार की समाज में गहरी पकड देखकर अंग्रेजों ने इस परिवार से मिलकर रहना ही उचित समझा था, उन्होंने रुद्रप्रताप के दादा को सरदार बहादुर की पदवी दी तो रुद्रप्रताप के पिता को मजिस्ट्रेट घोषित कर सरदार बहादुर की पदवी से विभूषित किया।
यह ठाकुर परिवार के गुणों का सम्मान था। 1942 में नरसिंहपुर जिले के मानेगांव के इस क्रांतिकारी सेनानी ठा. रुद्रप्रताप सिंह को गांधीजी ने स्वतंत्रता संग्राम का सेनापति घोषित किया। गांधीजी के आह्वान पर वे धन वैभव, नई गृहस्थी तथा अबोध बच्चों को छोड़ आजादी की लड़ाई में कूद पड़े।
1940 में आंदोलन करते हुए गिरफ्तार हुए और 6 माह की जेल हुई। बाहर आकर विदेशी वस्त्रों की होली जलाई और आंदोलन किए। युवकों की सुसंगठित सेना का गठन कर रेल के तारों को काटने और पुल उड़ाने की योजना बनाई। साथियों सहित गोटेगांव रेलवे स्टेशन के पास की 'गोहचर रेलवे पुलिया" को उड़ाने का कारनामा किया।
राजपूती शान के प्रतीक बन गए
बाद में जब पुलिस से सामना हुआ तो कुछ साथियों ने बचाव किया लेकिन ठा. रुद्रप्रताप ने छाती ठोककर कहा कि वे देशभक्त हैं। इस पर उन्हें साथियों सहित गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। उन्हें अंग्रेजों ने प्रलोभन दिए, धमकाया लेकिन वे टस से मस नहीं हुए। जेल में ही चेचक से उनकी मृत्यु हो गई। आजादी की लड़ाई में वे राजपूती शान के प्रतीक बन गए।