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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Nov 18, 2014 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

जूनियर इंजीनियर से संत रामपाल बनने का सफर

हरियाणा के जिले हिसार में स्थित सतलोक आश्रम के संचालक एक वक्‍त राज्‍य सरकार के मुलाजिम थे।

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Publish Date: Tue, 18 Nov 2014 06:10:19 PM (IST)Updated Date: Tue, 18 Nov 2014 06:16:18 PM (IST)
जूनियर इंजीनियर से संत रामपाल बनने का सफर

मल्‍टीमीडिया टीम। हरियाणा के जिले हिसार में स्थित सतलोक आश्रम के संचालक एक वक्‍त राज्‍य सरकार के मुलाजिम थे। उनका पद जूनियर इंजीनियर का था। सोनीपत जिले के धनाना गांव में 8 सितंबर, 1951 को भगत नंदराम के घर में जन्मे रामपाल ने इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया था, इसके बाद वो सरकारी नौकरी में लग गए थे।

नौकरी के दौरान ही कबीरपंथी संत स्‍वामी रामदेवानंद महाराज से उनकी नजदीकी बनी और उनसे प्रभावित होकर रामपाल उनके शिष्य बन गए।

शिष्य बनने के बाद रामपाल ने सरकारी नौकरी से इस्‍तीफा दे दिया और बाबा की सेवा में लगे रहे। फिर एक वक्त ऐसा भी आया जब वो इस पंथ की गद्दी पर आसीन हुए और खुद का आश्रम बना लिया। इस आश्रम में वो नियमित रूप से प्रवचन देते थे। इसके बाद संत रामपाल का कद और साम्राज्य दोनों बढ़ने लगा।


इसी बीच उनकी भक्‍त कमला देवी ने करौंथा गांव में आश्रम के लिए जमीन दान में दी। सन् 1999 में उन्होंने करौंथा में सतलोक आश्रम की स्थापना की।

देखते ही देखते इस आश्रम ने भव्य रूप ले लिया और यह कई एकड़ में फैल गया। इतना ही नहीं, हिसार जिला के बरवाला के अलावा अन्य राज्यों में भी रामपाल ने अपने आश्रम बना लिए।

शुरुआत कुछ वर्षों तक तो सब सामान्य रहा, लेकिन फिर धीरे-धीरे करौंथा व उसके आसपास के गांवों के लोगों और आर्यसमाजियों ने रामपाल द्वारा किए जा रहे प्रचार पर आपत्ति जतानी शुरू कर दी।

विवाद तब बढ़ गया, जब 2006 में आर्य समाज के संस्‍थापक स्वामी दयानंद की एक किताब पर संत रामपाल ने टिप्पणी कर दी थी। आर्य समाज ने इस टिप्‍पणी का कड़ा विरोध किया। इससे रामपाल के अनुयायियों और आर्यसमाजियों में हुए खूनी टकराव में एक व्यक्ति की मौत हो गई थी।

इधर, सतलोक आश्रम को खाली करने का मामला भी अदालत में चल रहा है। कुछ स्थानीय लोगों और आर्य समाजी लोगों की मांग है कि संत रामपाल करौंथा आश्रम खाली कर दें। इसे लेकर लंबी कानूनी लड़ाई हो चुकी है, इसके बाद आश्रम पर कब्जे के लिए चली लंबी कानूनी जंग में संत रामपाल को जीत मिली, जब 2009 में हाईकोर्ट ने सतलोक आश्रम को दोबारा संत रामपाल ट्रस्ट को सौंपने का आदेश दिया।

इस फैसले को हरियाणा सरकार और आर्यसमाज प्रतिनिधि सभा ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। 18 फरवरी 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने आर्य समाजियों की अपील खारिज कर दी। इसके बाद हुए प्रदर्शन में 12 मई 2013 को रोहतक के करौंथा गांव में जबरदस्त टकराव और हिंसा हुई, जिसमें एक व्‍यक्ति की मौत हो गई थी और पुलिस जवानों समेत 120 लोग घायल हुए थे।

2006 की उस घटना के बाद संत रामपाल को 21 महीने के लिए जेल भेज दिया गया था। आश्रम के प्रवक्ता राजकपूर का कहना है कि संत रामपाल को 21 महीने तक झूठे केस में जेल में रखा गया, लेकिन इसके बावजूद उनकी ओर से कोई प्रदर्शन नहीं किया गया।

लेकिन मौजूद स्थिति गौर करें तो इसी मामले में जारी अदालती कार्रवाई में पेश न होने की वजह से संत रामपाल के खिलाफ अवमानना के मामले में गैर जमानती वारंट जारी हो चुका है।

रामपाल कई बार बीमारियों का बहाना बनाकर अदालत में पेश होने से बचते रहे। आखिरकार अदालत ने उनके खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी कर दिया। जब पुलिस जब उन्‍हें गिरफ्तार करने पहुंची तो उनके अनुयायी 'कमांडो' बनकर सामने खड़े हो गए हैं।