
नई दिल्ली। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के जुर्म में उम्रकैद काट रही नलिनी की याचिका सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी। नलिनी ने उसकी रिहाई में बाधा बन रहे कानूनी प्रावधान को चुनौती दी थी।
नलिनी सहित राजीव हत्याकांड के सातों दोषियों की रिहाई पर सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही रोक लगा रखी है। यह रोक आदेश कोर्ट ने केंद्र सरकार की याचिका पर सुनवाई के बाद लगाया था। केंद्र ने राजीव गांधी के हत्यारों की रिहाई की तमिलनाडु सरकार की घोषणा को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे रखी है।
यह मामला पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष विचाराधीन है। उस मामले में भी दोषियों को माफी देकर रिहा करने के केंद्र और राज्य सरकार के कानूनी अधिकार का मसला विचाराधीन है।
नलिनी ने अलग से एक याचिका दाखिल कर उसकी रिहाई में रोड़ा बनी सीआरपीसी की धारा 435(1) (ए) को चुनौती दी थी। मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तू के नेतृत्व वाली पीठ ने नलिनी के वकील की दलीलें सुनने के बाद याचिका खारिज कर दी।
नलिनी का कहना था कि फांसी माफ होने के बाद वह 23 साल से जेल में उम्रकैद काट रही है। ट्रायल कोर्ट ने उसे 28 जनवरी, 1998 को मौत की सजा सुनाई थी, लेकिन तमिलनाडु के राज्यपाल ने 24 अप्रैल, 2000 को उसकी फांसी उम्रकैद में तब्दील कर दी थी।
नलिनी ने कहा था कि पिछले 15 वर्षों में तमिलनाडु सरकार ने 2200 कैदियों को माफी देकर समयपूर्व रिहाई दी है।
उन कैदियों ने सिर्फ 10 साल तक की ही सजा काटी थी। लेकिन, उसके मामले में धारा 435 (1)(ए) के कारण विचार नहीं किया गया क्योंकि उसके केस की जांच सीबीआई ने की है। उसने धारा 435 (1)(ए) को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की थी।
क्या कहती है धारा 435 (1)(ए)
यह धारा कहती है कि जिन मामलों में दोषी को केंद्रीय कानूनों के तहत सजा सुनाई गई होगी या जिनकी जांच सीबीआइ या अन्य किसी केंद्रीय एजेंसी ने की होगी उनमें दोषी को माफी देकर छोड़ने से पहले राज्य सरकार को केंद्र की मंजूरी लेनी होगी।