
आगरा। देशभर में जहां हर आदमी और संस्थान 500 और 1000 रुपए के नोट के बंद होने के बाद में थोड़ा परेशान दिख रहा है, वहीं आगरा के राधास्वामी सत्संग पर इसका कोई असर नहीं पड़ा है। यहां की अर्थव्यवस्था अभी भी 1980 के दशक में है।
शहर के दयालबाग क्षेत्र में स्थित 300 एकड़ में फैले राधास्वामी सत्संग की वित्तीय लेन-देन की अपनी प्रणाली है। यहां रहने वाले करीब 800 परिवारों को अविश्वसनीय कीमतों पर दैनिक उपयोग की चीजें मिलती हैं। यहां चिकित्सा सुविधाएं महज दो रुपए में, दूध 14 रुपए प्रति लीटर में मिलता है।
यहां आज भी 50 पैसे के सिक्के चलते हैं, जिनसे आप कई चीजें खरीद सकते हैं। वास्तव में, सभा ने 500 और 1000 रुपए के नोटों का परिचालन काफी लंबे समय पहले ही बंद कर दिया था। यहां बनी अपनी उचित कीमतों की दुकानों पर उपलब्ध माल कम कीमतों पर दिया जाता है। इसका एक अन्य कारण नकली मुद्राओं को प्राप्त करने की संभावना को खत्म करना था।
नए 500 और 2000 के नोट हैं पाकिस्तान के मुंह पर तमाचा
राधास्वामी सत्संग सभा के सचिव जीपी सत्संगी ने कहा कि हमारी धारणा लाभ कमाने की नहीं है। हम भक्तों को भी बड़ा दान करने के लिए प्रोत्साहित नहीं करते हैं। एक भक्त को एक साल में 10 रुपए से लेकर 1000 रुपए तक ही दान करने की अनुमति है।
चीफ ऑडिट ऑफिसर, स्वामी दयाल सिंह ने बताया कि यहां बड़े पैमाने पर चीजों का निर्माण किया जाता है और उत्पादन लागत पर दो से तीन फीसद का लाभ लेकर बेचा जाता है। इसके अलावा, दवाओं और सब्जियों को उसी कीमत पर बेचा जाता है, जिस कीमत पर उन्हें थोक बाजार से खरीदा गया है। दूसरे शब्दों में, कहें तो उन्हें बाजार मूल्य से 40 से 50 फीसद कम कीमत में बेचा जाता है।
हाई बीम लाइट जलाने वाले ड्राइवर्स को पुलिस ने ऐसे सिखाया सबक
उन्होंने उदाहरण देकर बताया कि क्रेप बैंडेज बाहर 80 रुपए में मिलता है, लेकिन इसे यहां आठ रुपए में ही बेचा जाता है। कारण उसका होलसेल मूल्य ही उतना है। वास्तव में 100 साल से अधिक पुरानी बस्ती आत्मनिर्भर है, जिसके पास अपनी कृषि भूमि के अलावा अपने स्वयं के शैक्षिक और स्वास्थ्य संस्थाएं हैं। छोटे पैमाने पर परिसर के अंदर ऑपरेटिंग इकाइयों साबुन, खाद्य उत्पादों और जूते बनाए जाते हैं, जो उनकी गुणवत्ता और स्थायित्व के कारण मांग में ज्यादा रहते हैं।