
नई दिल्ली। सबरीमाला मंदिर बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि महिलाओं के मंदिर में प्रवेश पर लगा प्रतिबंध महिला-विरोधी नहीं है और महिलाएं स्वेच्छा से इसका पालन करती हैं। मगर, शीर्ष न्यायालय ने कहा कि रीति-रिवाज या धार्मिक परंपराएं संविधान के अनुसार होनी चाहिए। बताते चलें कि इस मंदिर में 10-50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर रोक है।
इस मामले में दायर याचिका की सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने अनुच्छेद-25 और 26 का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति को सिर्फ ‘जन स्वास्थ्य, जन व्यवस्था और नैतिकता’ के आधार पर ही मंदिर में घुसने से रोका जा सकता है। मंदिर में विशेष आयुवर्ग की महिलाओं को जिनका मासिक धर्म शुरू हो चुका होता है, मंदिर में आने से रोका जाता है, क्योंकि भगवान अयप्पा को ब्रह्मचारी माना जाता है।
कोर्ट ने कहा कि बोर्ड अगर मान्यताओं की बात करता है, तो साबित करे कि महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी धार्मिक प्रथाओं का अभिन्न अंग है। क्या सिर्फ माहवारी से ही महिलाएं मलिन हो जाती हैं? उनके प्रवेश पर पाबंदी संवैधानिक अधिकारों और गरिमा का हनन है।
भगवान अय्यप्पा मंदिर का संचालन करने वाले त्रावणकोर देवास्वम बोर्ड की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी पेश हुए थे। उन्होंने कहा कि देश की मस्जिदों में भी महिलाओं को प्रवेश की अनुमति नहीं है। आस्था पर आधारित इन परंपराओं के परीक्षण से मुद्दों का पिटारा खुल जाएगा।
शिया मुस्लिम मुहर्रम में शरीर लहूलुहान कर लेते हैं। क्या सुप्रीम कोर्ट तरक्की पसंद होने के नाते इस पर भी रोक लगाएगा? इस पर पीठ ने कहा कि 1950 में संविधान लागू होने के बाद सब कुछ संविधान के दायरे में है। सबरीमाला मंदिर में कई ऐसे अनोखे रीति रिवाज और विधान हैं, जिन पर गैर हिंदुओं की भी आस्था है। महज एक याचिका के आधार पर हिंदू धर्म को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। बोर्ड ने कोर्ट को ऐसे धार्मिक संस्थानों की सूची भी सौंपी, जिनमें पुरुषों और स्त्रियों के प्रवेश पर पाबंदी है।
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पीठ ने सिंघवी से कहा कि देवस्वाम बोर्ड को स्थापित करना होगा कि निश्चित आयु वर्ग की महिलाओं का प्रवेश वर्जित करना धार्मिक परंपरा का आवश्यक और अनिवार्य हिस्सा है। पीठ ने केरल हाईकोर्ट में बोर्ड के कथन में अंतर्विरोध का जिक्र करते हुए कहा कि तीर्थयात्रा शुरू होने पर पहले पांच दिन सबरीमाला मंदिर में सभी आयु वर्गों की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति होती थी। इसके बाद भीड़ बढ़ने से उनके प्रवेश पर रोक लगाई गई थी। यानी उनके प्रवेश पर सीधे कोई पाबंदी नहीं है।
बताते चलें कि शीर्ष अदालत ने 19 जुलाई को सुनवाई के दौरान कहा था कि महिलाओं में दस वर्ष की आयु से पहले भी मासिक धर्म शुरू हो सकता है। इस मामले में न्यायमित्र वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन का कहना था कि एक विशेष आयु वर्ग की महिलाओं को अलग करना उन्हें अछूत मानने जैसा है, जो संविधान के अनुच्छेद-17 कि तहत गलत है। इस पर पीठ ने कहा था कि मंदिर में प्रवेश से वंचित की जा रही महिलाओं में सवर्ण वर्ग की भी हो सकती हैं, जबकि यह प्रावधान सिर्फ अनुसूचित जातियों से संबंधित है।
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