कृति गर्ग

मुस्कान देवता। इस 15 वर्षीय लड़की को पहली नजर में देखकर कोई भी उसे सामान्य समझता है लेकिन गौर करने पर पाता है कि उसकी नजर में थोड़ा भेंगापन है और चलते हुए वह थोड़ी शिथिल भी पड़ जाती है। मुस्कान हिमीप्लीजिया से लड़ रही है। यह ऐसी अवस्था है जिसमें शरीर का एक हिस्सा लकवाग्रस्त हो जाता है।

मुस्कान जब जन्मी तो उसके दिल में छेद थे, फेफड़े पूरी तरह विकसित नहीं हुए थे और इस बात की आशंका थी कि उसे कई तरह की न्यूरोलॉजिकल समस्याएं घेरेंगी।

बचपन के आरंभिक वर्ष तो इन शंकाओं में घिरे ही बीते। 13 वर्ष इस बच्ची ने सिर्फ इसलिए इंतजार किया कि वह पैर में जूते पहन सके और इसके लिए लंबे समय तक कठिन फिजियोथैरेपी प्रक्रिया भी सही।

इन तमाम कठिनाइयों को पार करते हुए मुस्कान आज न्यूजीलैंड के घर-घर में पहचाना जाने वाला नाम बन गई है। उस देश में जो उसका दूसरा घर है। हिमीप्लीजिया के साथ संघर्ष तो मुस्कान की साहसभरी कहानी का एक हिस्सा मात्र है। उस संघर्ष का जो 11 वर्ष पहले तब शुरू हुआ था जब उसके माता-पिता इलाज और बेहतर जिंदगी की तलाश में उसे न्यूजीलैंड ले आए थे।

इन 11 वर्षों में इस लड़की ने एक लेखक और प्रेरक व्याख्याता के तौर पर न्यूजीलैंड में ख्याति अर्जित की। चर्चित 'टेड टॉक्स' में जगह बनाई, बहुत से अवॉर्ड जीते और उस स्कूल के बच्चों के लिए रोल मॉडल बनी जहां कभी अपनी अशक्तता के कारण वह खुद को दूसरों से अलग-थलग पाती थी।

मुस्कान ने अपनी पहली किताब 9 साल की उम्र में तब लिखी थी जब उसे यह पता चला था कि ऑकलैंड के जिस सेंटर में वह फिजियोथैरेपी ले रही है, उसे एक एक्सरसाइज बाइक की जरूरत है। यह किताब बुद्धि के देवता 'गणेश' के बारे में थी। यह पुस्तक आगे चलकर शिक्षा मंत्रालय के उस 2010 जर्नल में शामिल की गई जो न्यूजीलैंड के सभी स्कूलों में बांटा जाना था। इसने मुस्कान को लोगों के दिल में जगह और प्रशंसा दिलवाई।

करीब 10 वर्षों तक मुस्कान की फिजियोथैरेपिस्ट रही जो वॉकर कहती हैं, 'मुस्कान में आए बदलाव का बहुत श्रेय इस किताब को जाता है। इस किताब ने उसे एक अंतर्मुखी और शर्मीली लड़की से अद्भुत आत्मविश्वासी, मिलनसार और साहसी लड़की में बदल दिया। हम हमेशा से चाहते थे कि वह अपनी अशक्तता से आगे देख सके।'

मुस्कान का जन्म नियत समय से पहले बहुत सारी शारीरिक परेशानियों के साथ हुआ। जन्म के समय उसका वजन 1.2 किलो था। गुजरात के सबसे बड़े शहर अहमदाबाद के डॉक्टर इस बच्ची के परिवार को यह भरोसा नहीं दिला पा रहे थे कि वह बचेगी। आईसीयू में भर्ती करने के बाद भी उसकी सेहत में सुधार नहीं था।

माइक्रोबायोलॉजिस्ट रह चुकी और स्वतंत्र पत्रकारिता करने वाली मुस्कान की मां जैमिनी देवता बताती हैं, 'हमें बस धैर्य रखना था मगर मैं आशंकाओं से सिहर उठती थी। अगले कुछ महीनों तो मैं मुस्कान के पास सो भी न सकी क्योंकि मुझे यही डर लगता था कि उसे कुछ हो जाएगा।' ऐसी स्थिति में दादा-दादी ने मुस्कान की देखभाल का जिम्मा संभाला। मुस्कान के दादा ने तो अपनी नौकरी भी छोड़ दी। उन्होंने कई रातें उसे सुलाने में जागकर काटीं, उसकी मसाज की और उसे बूंद-बूंद करके दूध पिलाया। मुस्कान की दादी सुहासिनी देवता कहती हैं, 'हम इस बात का खास खयाल रखते थे कि मुस्कान बीमार न पड़ जाए।'

समय के साथ और भी दिक्कतें सामने आईं। जैसे जब उसने चलना शुरू किया तो दादी ने देखा कि उसके जोड़ कमजोर हैं। उसकी आंखों का भेंगापन भी सामने आने लगा। शिशु रोग विशेषज्ञों ने उसे मल्टीपल न्यूरोलॉजिकल डेफिसिट बताया जिसके कारण शरीर के कई हिस्सों में कमजोरी आ जाती है। इसके साथ ही उसे एक पैर में लकवा तो था ही। एक साथी पत्रकार ने तब जैमिनी को सलाह दी कि मुस्कान के पिता अरुण को ऑस्ट्रेलिया या न्यूजीलैंड चले जाना चाहिए ताकि उनकी बिटिया को अच्छी चिकित्सा सेवाएं मिल सकें। परिवार के लिए इस तरह किसी दूसरे देश बस जाना आसान नहीं था।

मुस्कान बताती हैं, 'मुझे स्कूल जाने वाले दिन याद हैं जो मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं थे क्योंकि कोई भी मेरे साथ खेलना नहीं चाहता था या मेरा दोस्त नहीं बनना चाहता था। आधी छुट्टी का वक्त तो और भी कठिन होता था क्योंकि उस समय में इधर-उधर घूमती रहती थी और आखिरकर लाइब्रेरी चली जाती थी। मैं खूब पढ़ती थी। शुरुआत में मुझे लगा कि मेरी कमजोरी की वजह से टीचर्स मुझे सहारा देते हैं, लेकिन ऐसा नहीं था। टीचर्स मेरे साथ सामान्य बच्चे की तरह बर्ताव कर रही थीं।'

एक बार मुस्कान की मां ने उससे कहा था कि वह अपने दिमाग से चाहे तो पूरी दुनिया तक पहुंच सकती है। फिर तो मुस्कान ने विपरीत परिस्थितियों में सफलता पाना आदत बना लिया।

12 वर्ष की उम्र में उसने एक हिंदी स्टेशन 'रेडियो तराना' में अपना प्रोग्राम 'मुस्कान एंड यू' प्रस्तुत करना शुरू किया जिसमें हर सप्ताह 59 हजार श्रोता से वह बात करती। मुस्कान ने बुलीइंग, सेल्फ इस्टीम, रोड सेफ्टी, ग्लोबल वार्मिंग, बॉलीवुड गॉसिप जैसे विषयों के सहारे कई लोगों को अपने इस कार्यक्रम से जोड़ा। सबसे रोचक था बर्थडे संदेश वाला हिस्सा, जिसमें लोग संदेश भेजते और मुस्कान उनमें थोड़ा सा टिवस्ट डालकर उन्हें प्रस्तुत करती।

इसी बीच स्थानीय अखबार में मुस्कान की पहली बायलाइन स्टोरी छपी और बीते वर्ष उसने न्यूजीलैंड के अशक्त पुरस्कारों की जूनियर केटेगरी में 'बेस्ट एटीट्यूड' अवॉर्ड जीता। बीते वर्ष वह 'प्राइड ऑफ न्यूजीलैंड' के लिए नामित होने वाली सबसे युवा प्रतिभागी थी और इस वर्ष वह फिर इस श्रेणी में नामित हुई है। मुस्कान की मां का कहना है, 'पिछले वर्ष वह भले ही न जीती लेकिन उसे पहचान मिलने से ही दूसरे भी प्रेरित होंगे।'

मुस्कान का 9 वर्षीय भाई अमान भी मानता है कि उसकी बहन बहुत अद्भुत है। वह कहता है, 'मैं तो एक समय में केवल एक ही व्यक्ति से बात कर पाता हूं लेकिन मेरी बहन मुस्कान एक ही समय में एक हजार लोगों से बात करके उन्हें प्रेरित करती है।'

13 साल बाद मुस्कान के पैर की मांसपेशियां इस लायक हो सकीं कि उसकी करेक्टिव सर्जरी की जा सके। इस सर्जरी के बाद उसने सबसे पहले जूता पहनने की इच्छा व्यक्त की। यह उसका बहुत मासूम सा सपना था। इस सर्जरी के बाद मुस्कान दूसरी किताब आत्मकथा लिखना चाहती थी। अगले आठ महीनों में 'आई ड्रीम' तैयार थी। इस आत्मकथा की बिक्री से होने वाली आय का कुछ हिस्सा ऑकलैंड के उस अस्पताल को भी जाएगा जहां मुस्कान की सर्जरी हुई ताकि और बच्चों को भी मदद मिल सके।

यह किताब 'आई ड्रीम' ऑकलैंड के वेस्टलैक गर्ल्स स्कूल में 9 वीं के विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम में 'साहस' शीर्षक वाली यूनिट में शामिल की गई है। इस आश्चर्यचकित करने वाले सफर के साथ मुस्कान अशक्त बच्चों की एम्बेसेडर बन गई है। वह कहती है, 'अगर आप कुछ करना चाहते हो तो हमेशा वैसा करके दिखा सकते हो।'

(यह लेख मेलबर्न के ऑनलाइन प्रकाशन The Citizen में प्रकाशित स्टोरी का संपादित अंश है।)

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