अतुल वासिंग, बिलासपुर(छत्‍तीसगढ़)। बोलने-सुनने में असमर्थ श्रद्धा वैष्णव ने इस कमजोरी से हार नहीं मानी, खेलों में रुचि ने उनकी प्रतिभा में निखार लाया। लड़की होने के बाद भी क्रिकेटर बनने की चाह ने आज उसे ऐसे पायदान में लाकर खड़ा कर दिया है, जो सामान्य खिलाड़ियों के लिए भी दूर की कौड़ी की बात है।

इशारों-इशारों में अपने कोच की बात समझकर आज श्रद्धा स्कूल लेवल की राष्ट्रीय प्रतियोगिता में अपना व राज्य का नाम रोशन करते हुए राज्य की एक प्रतिभावान महिला खिलाड़ी बनकर उभरी हैं। उसलापुर में रहने वाली श्रद्धा वैष्णव जन्म से ही बोलने-सुनने में असमर्थ है, लेकिन छोटे भाई ओम को क्रिकेट खेलते हुए देखकर क्रिकेटर बनने की ठानी।

उनके पिता रमेश वैष्णव अपने छोटे बेटे को क्रिकेट का प्रशिक्षण देने रोजाना सेकरसा क्रिकेट स्टेडियम ले जाते थे, उनके साथ कभी-कभी श्रद्धा भी जाती थी। जहां उसने भाई को इशारे में कहा कि मुझे भी क्रिकेट खेलना है। उसके भाई ने यह बात अपने पिता को बताई। तब पिता ने श्रद्धा को बताया कि यहां सिर्फ लड़कों को क्रिकेट का प्रशिक्षण दिया जाता है और तुम बोल व सुन भी नहीं सकती।

क्रिकेट सीखना तुम्हारे बस की बात नहीं है। लेकिन श्रद्धा की बार-बार की जिद को देखते हुए उनके पिता ने क्रिकेट अकादमी के कोच से मिलाने की बात कही। इसके बाद उनके पिता ने स्पोर्ट एंड यूथ वेलफेयर क्रिकेट कोचिंग सेंटर के कोच दिलीप सिंह से बात की।

श्रद्धा के क्रिकेटर बनने की चाह व उसके बुलंद हौसले को देखकर कोच दिलीप सिंह ने उसे कोचिंग देने की हामी भर दी। इसके बाद कोच ने उसे रोजाना ग्राउंड आकर प्रशिक्षण लेने की बात कही। प्रशिक्षण के पहले दिन ही उसने तेजतर्रार गेंदबाजी कर कोच सहित सभी खिलाड़ियों को प्रभावित किया।

उनकी गेंदबाजी की खास बात यह है कि वे गेंद को स्वींग कराने में माहिर है। इसके बाद उसे लेफ्ट आर्म फास्ट बॉलर बनाने का निर्णय कोच ने लिया। प्रशिक्षण के कुछ महीने बाद ही वह तेज गति से गेंदबाजी करते हुए हरेक गेंद को स्वींग कराने में माहिर हो गईं।

स्कूल लेवल की जिला स्तरीय क्रिकेट प्रतियोगिता में खेलने का मौका मिला। जहां तेज गेंदबाजी के बदौलत स्पर्धा की सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी बनकर उभरी।


2013 से कर रही राज्य का प्रतिनिधित्व

अंध-मुख-बधिर स्कूल तिफरा में अध्ययनरत श्रद्धा इसी स्कूल में अध्ययनरत रहते लगातार 3 बार स्कूल नेशनल में राज्य का प्रतिनिधित्व कर चुकी है। 2013 से 2015 तक यह सिलसिला जारी है। जिसमें वह बिलासपुर, छत्तीसगढ़ समेत अपने स्कूल का नाम रोशन करती आ रही है।

लड़कों को देती हैं टक्कर

वर्तमान में घरेलू क्रिकेट के अंतर्गत जब भी मैच होता है तो श्रद्धा अपने ग्रुप की टीम में लड़कों के बीच मुख्य गेंदबाज की कमान संभालती हैं।

राष्ट्रीय टीम से खेलने का सपना

श्रद्धा का मानना है कि उनका सफर तो अभी शुरू हुआ है। वे सफलता की सीढ़ी के अभी पहले पायदान पर ही पहुंची हैं। वो चाहती है कि स्टेट क्रिकेट बोर्ड उसे हर सुविधा दे, ताकि वे आगे चलकर राष्ट्रीय टीम में अपना स्थान सुनिश्चित कर सके।

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