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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Apr 16, 2018 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

थकान मिटाने के लिए बनाती थीं चित्र, मिला राष्ट्रीय सम्मान

मेरी उम्र उस वक्त करीब 12 साल रही होगी। मैं परिवार के साथ भोपाल में मजदूरी करती थी।

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Publish Date: Mon, 16 Apr 2018 04:01:16 AM (IST)Updated Date: Tue, 17 Apr 2018 08:00:07 AM (IST)
थकान मिटाने के लिए बनाती थीं चित्र, मिला राष्ट्रीय सम्मान

हर्षल सिंह राठौड़, इंदौर। मेरी उम्र उस वक्त करीब 12 साल रही होगी। मैं परिवार के साथ भोपाल में मजदूरी करती थी। मजदूरी करने के बाद जब मैं थक जाती तो उस थकान को मिटाने के लिए मैं यहां-वहां चित्रकारी करने लगती। उस वक्त थकान मिटाने से ज्यादा जरूरी होता था, पेट की भूख मिटाना और उसका जरिया केवल मजदूरी ही था। एक दिन भारत भवन के तत्कालीन निर्देशक स्वामी नाथन की नजर मेरी चित्रकारी पर पड़ी। इसके बाद से मेरा जीवन बदल गया। यह दास्तां है कई राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कर चुकीं पिथौरा चित्रकार लाड़ोबाई की।

शहर में आयोजित पिथौरा कार्यशाला में प्रशिक्षण देने भोपाल से आईं लाड़ोबाई जीवन के उन पन्नों को पलटते हुए आज भी उतनी ही खुश हो जाती हैं, जितनी उस वक्त हुई थी जब स्वामी नाथन ने उन्हें मजदूरी के दलदल से निकालकर कला के सरोवर में खिलने का मौका दिया। वे बताती हैं कि जो चित्रकारी थकान मिटाने का जरिया थी, वही अब उनकी पहचान बन चुकी है।


अब तो पूरा परिवार करता है पिथौरा

झाबुआ के बावड़ी गांव से मजदूरी के लिए परिवार सहित भोपाल आईं लाड़ोबाई बताती हैं कि जब मैं 12 वर्ष की थी, तब एक दिन की मजदूरी के एवज में 5 रुपए मिलते थे, तब गुजारा दुश्वार हो जाता था। आज पूरा परिवार (पति, चार बेटे, चार बहुएं और तीन बेटी) पिथौरा चित्रकारी करते हैं और इसे दूसरों को सिखाते भी हैं। इससे न केवल परिवार आर्थिक रूप से सक्षम हुआ, बल्कि देशभर में पहचान भी मिली।

इंदिरा गांधी ने भी किया पुरस्कृत

कई पुरस्कार प्राप्त कर चुकीं लाड़ोबाई को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह भी पुरस्कृत कर चुके हैं। वे बताती हैं कि इंदिरा गांधी ने उनकी कलाकृतियों की प्रशंसा करते हुए पुरस्कार राशि के रूप में 50 हजार रुपए का चेक दिया था। तब चेक का महत्व नहीं जानती थी और उसे मिट्टी की कोठी में रख दिया था। कुछ समय बाद जब इसे निकाला तो उसका कुछ हिस्सा कीड़े ही चट कर गए थे। पर अब तकनीक और बैंकिंग सभी की समझ है और यह केवल कला के कारण ही संभव हुआ।

जंगलों से लाई वनस्पतियों से तैयार होते हैं रंग

सावन से अक्षय तृतीया तक बनाई जाने वाली पिथौरा चित्रकला केवल कला नहीं, बल्कि इनके लिए ईश्वर स्वरूप है। इसे बनाने के लिए प्रकृति से ही रंग लिए जाते हैं। इन रंगों को बनाने के लिए वनस्पतियां लेने जंगल में ही जाना पड़ता है। कई दिनों की तलाश के बाद पर्याप्त रंग के लिए वनस्पतियां मिल पाती हैं। खांकर के फूल से लाल रंग, सेमल के फूल से पीला रंग, बालोर की पत्तियों से हरा रंग, लकड़ी के कोयले से काला रंग बनाया जाता है। इन रंगों को धावड़े और बबूल के गोंद में मिलाकर रंग किया जाता है।