
- पायल शर्मा, मलेशिया की राजधानी कुआलालंपुर से...
बाटु केव्स का इतिहास 40 करोड़ वर्ष पुराना है। प्राचीन काल में इन गुफाओं का इस्तेमाल अनेक प्रकार की जनजातियां रहने के लिए करती थी। उस समय भारतीय व्यापारी थम्बुस्वामी पल्लई प्रमुख गुफा के प्रवेश द्वार की बनावट से काफी प्रभावित हुए थे। यह गुफाएं युद्ध में इस्तेमाल होने वाले अस्त्र भाले के आकार की तरह हैं।
उन्होंने ही इस गुफा को भगवान मुरुगन के नाम पर समर्पित करने का फैसला किया और थेन्दयुथापनी मंदिर की स्थापना की। वर्ष 1890 में पिल्लई ने कुलालालंपुर में श्री महामरिअम्मन मंदिर बनवाया और वहां भगवान मुरुगन स्वामी की मूर्ति स्थापित की।
बाटु केव्स स्थित भगवान मुरुगन के मंदिर में तमिल महीने थाई की पूर्णमासी को थाईपुसम नाम का त्योहार मनाया जाता है। इसे भगवान मुरुगन के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है। तीन दिन तक चलने वाले इस त्योहार के लिए देशभर(मलेशिया) से हजारों की संख्या में तमिल एकत्रित होते हैं।
मुरुगन हैं यहां कुमारा स्वामी
मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव ने अपनी पत्नी उमा( पार्वती) के साथ नृत्य किया था और इसी दिन उनके ज्येष्ठ पुत्र कार्तिकेय (मुरुगन स्वामी) को अपनी मां की ओर से दैवीय भाला प्राप्त हुआ था। दुनियाभर में तमिल लोग जहां इन्हें मुरुगन कह कर संबोधित करते हैं वही तेलुगू लोग कुमारा स्वामी के नाम से पूजते हैं।
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भगवान कार्तिकेय के हजारों नाम है। थाईपुसम के दिन भगवान मुरुगन की मूर्ति को सुगंधित जल से नहलाया जाता है। उनका श्रृंगार किया जाता है। त्योहार के दूसरे दिन रथ में प्रभु की झांकी निकाली जाती है।
ऐसे पहुंचें : बाटु केव्स तक बस, टैक्सी या ट्रेन से पहुंचा जा सकता है। पास ही स्थित एक अन्य गुफा को बैट केव्स नाम दिया गया है। अंधकार से भरी इन गुफाओं में चमगादड़ों को गुफा की ऊंचाइयों पर लटके आसानी से देखा जा सकता है।
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गाइड आपको गुफा की प्राचीनता, रख-रखाव के बारे में बताते चलते हैं। एक अन्य गुफा भी है जिसे रामायण केव्स कहा जाता है। यहां हनुमान जी की बड़ी मूर्ति स्थापित की गई है।