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एमपी में है अनोखा गणेश मंदिर, नाम है बादशाह हलवाई, गर्भगृह में 16 भुजाओं वाले गणपति

मंदिर की विशेषता केवल गर्भगृह तक सीमित नहीं है। परिसर के स्तंभों और स्थापत्य में धार्मिक प्रतीकों तथा देवी-देवताओं के अंकन दिखाई देते हैं।

By Surendra DubeyEdited By: Navodit Saktawat
Publish Date: Thu, 17 Sep 2026 12:25:28 PM (IST)Updated Date: Thu, 17 Sep 2026 12:32:18 PM (IST)
एमपी में है अनोखा गणेश मंदिर, नाम है बादशाह हलवाई, गर्भगृह में 16 भुजाओं वाले गणपति
बादशाह हलवाई मंदिर के सोलह भुजी गणेश। नईदुनिया।

HighLights

  1. सोलह भुजाओं में विराजे गणपति, पहाड़ी पर सदियों पुरानी आस्था।
  2. बादशाह हलवाई की दुर्लभ प्रतिमा में गणेश उपासना का स्वरूप।
  3. यहां पर रिद्धि-सिद्धि के साथ नक्षत्र-नवग्रह और श्री यंत्र भी मौजूद।

सुरेन्द्र दुबे, नईदुनिया जबलपुर। संस्कारधानी के गौरीघाट मार्ग से लगे पोलीपाथर क्षेत्र की पहाड़ी पर करीब सौ सीढ़ियां चढ़ने के बाद एक ऐसा धार्मिक स्थल सामने आता है, जहां गणेश आराधना के साथ शहर की पुरानी स्थापत्य और धार्मिक स्मृतियां भी दिखाई देती हैं। यह है बादशाह हलवाई मंदिर।

मंदिर के गर्भगृह में विराजमान भगवान गणेश की 16 भुजाओं वाली प्रतिमा इसका सबसे विशिष्ट आकर्षण है। गणेश के साथ रिद्धि-सिद्धि की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं।

सामान्यतः चार, छह या आठ भुजाओं वाले गणेश स्वरूप अधिक दिखाई देते हैं। ऐसे में यहां का बहुभुजाधारी स्वरूप श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण रखता है। प्रतिमा में गणेश विभिन्न आयुध और प्रतीकों के साथ विराजमान हैं।

पत्थरों में पुरानी कला की झलक

  • मंदिर की विशेषता केवल गर्भगृह तक सीमित नहीं है। परिसर के स्तंभों और स्थापत्य में धार्मिक प्रतीकों तथा देवी-देवताओं के अंकन दिखाई देते हैं।
  • स्थानीय विवरणों में 27 नक्षत्र, नवग्रह और दिशाओं से जुड़े अंकन का उल्लेख मिलता है। मंदिर के ऊपरी हिस्से में श्री यंत्र भी बताया जाता है।
  • परिसर में शिव-पार्वती सहित अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी हैं। मंदिर और प्रतिमा के काल को लेकर अलग-अलग मत मिलते हैं।
  • कुछ विवरण इसे 13 वीं सदी से जोड़ते हैं, जबकि पुरातत्व विभाग के बोर्ड से जुड़े हालिया उल्लेख में मंदिर को 16 वीं-17 वीं सदी का बताया गया है।
  • इसलिए इसे निश्चित कालखंड से जोड़ने के बजाय सदियों पुरानी धार्मिक-स्थापत्य विरासत के रूप में देखना अधिक उपयुक्त है।

गुफा और रानी दुर्गावती की लोककथा

मंदिर के पीछे एक गुफा है, जिसे स्थानीय मान्यता में रानी दुर्गावती से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि वे मदन महल क्षेत्र से गुफा के रास्ते यहां पूजा के लिए आती थीं। गुफा का संबंध राजाघाट क्षेत्र से जोड़ने वाली मान्यताएं भी प्रचलित हैं। हालांकि इन बातों को प्रमाणित इतिहास के बजाय स्थानीय लोकविश्वास के रूप में देखना उचित होगा।


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नाम के पीछे भी कहानी

स्थानीय परंपरा के अनुसार मंदिर के जीर्णोद्धार में एक हलवाई ने आर्थिक सहयोग किया था। इसके बाद मंदिर की पहचान बादशाह हलवाई मंदिर के नाम से प्रचलित हुई। आज यह मंदिर अपनी 16 भुजाओं वाले गणेश, रिद्धि-सिद्धि, स्थापत्य और लोककथाओं के कारण जबलपुर की धार्मिक स्मृतियों में अलग स्थान रखता है। गणेशोत्सव के बीच यहां पहुंचना मानो उत्सव से पीछे उस लंबी आस्था-परंपरा तक पहुंचना है, जिसकी जड़ें शहर की पुरानी पहाड़ियों और पत्थरों में सुरक्षित हैं।