
सुरेन्द्र दुबे, नईदुनिया जबलपुर। संस्कारधानी के गौरीघाट मार्ग से लगे पोलीपाथर क्षेत्र की पहाड़ी पर करीब सौ सीढ़ियां चढ़ने के बाद एक ऐसा धार्मिक स्थल सामने आता है, जहां गणेश आराधना के साथ शहर की पुरानी स्थापत्य और धार्मिक स्मृतियां भी दिखाई देती हैं। यह है बादशाह हलवाई मंदिर।
मंदिर के गर्भगृह में विराजमान भगवान गणेश की 16 भुजाओं वाली प्रतिमा इसका सबसे विशिष्ट आकर्षण है। गणेश के साथ रिद्धि-सिद्धि की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं।
सामान्यतः चार, छह या आठ भुजाओं वाले गणेश स्वरूप अधिक दिखाई देते हैं। ऐसे में यहां का बहुभुजाधारी स्वरूप श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण रखता है। प्रतिमा में गणेश विभिन्न आयुध और प्रतीकों के साथ विराजमान हैं।
मंदिर के पीछे एक गुफा है, जिसे स्थानीय मान्यता में रानी दुर्गावती से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि वे मदन महल क्षेत्र से गुफा के रास्ते यहां पूजा के लिए आती थीं। गुफा का संबंध राजाघाट क्षेत्र से जोड़ने वाली मान्यताएं भी प्रचलित हैं। हालांकि इन बातों को प्रमाणित इतिहास के बजाय स्थानीय लोकविश्वास के रूप में देखना उचित होगा।
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स्थानीय परंपरा के अनुसार मंदिर के जीर्णोद्धार में एक हलवाई ने आर्थिक सहयोग किया था। इसके बाद मंदिर की पहचान बादशाह हलवाई मंदिर के नाम से प्रचलित हुई। आज यह मंदिर अपनी 16 भुजाओं वाले गणेश, रिद्धि-सिद्धि, स्थापत्य और लोककथाओं के कारण जबलपुर की धार्मिक स्मृतियों में अलग स्थान रखता है। गणेशोत्सव के बीच यहां पहुंचना मानो उत्सव से पीछे उस लंबी आस्था-परंपरा तक पहुंचना है, जिसकी जड़ें शहर की पुरानी पहाड़ियों और पत्थरों में सुरक्षित हैं।