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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Sep 25, 2015 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

अनंत चतुर्दशी के दिन भुजा में इसीलिए बांधा जाता है अनंत

कौण्डिन्य ऋषि ने जब उस अनंत के बारे में पूछा तो उन्होंने सारी बात बता दी।

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Publish Date: Fri, 25 Sep 2015 03:02:58 PM (IST)Updated Date: Fri, 25 Sep 2015 03:57:30 PM (IST)
अनंत चतुर्दशी के दिन भुजा में इसीलिए बांधा जाता है अनंत

अनंत चतुर्दशी की दिव्य कथा का उल्लेख महाभारत में मिलता है। एक बार पांडव श्रेष्ठ महाराज युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ करवाया। यज्ञमंडप का निर्माण सुंदर तो था ही अद्भुत भी था। वहां का फर्श ऐसा था उसमें जल में भूमि और भूमि में जल दिखाई दे रहा था। हालांकि ये महज भ्रम था।

उस यज्ञ मंडप में घू्मते हुए दुर्योधन एक तालाब में गिर गया। यह सब कुछ जब द्रौपदी ने देखा तो उन्होंने कहा, 'अंधों की संतान अंधी और वह जोर-जोर से हंसने लगीं।' यह देखकर दुर्योधन को बहुत क्रोध आया लेकिन वह चुप रहा।


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कुछ दिनों बाद दुर्योधन ने पांडवों को चौसर खेल के लिए आमंत्रित किया। चौसर का खेल जुए की तरह ही होता था। पांडव अपना सब कुछ इस खेल में हार गए। तब उन्हें बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास पर जाना पड़ा।

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इस बात से युधिष्ठिर दुखी थे। उन्होंने एक बार श्रीकृष्ण से कहा, 'हमें ये दिन क्यों देखने पड़ रहे हैं। और हम इससे कैसे निकल सकते हैं।' तब श्रीकृष्ण बोले, 'युधिष्ठिर तुम विधिपूर्वक अनंत भगवान का व्रत करो। तुम्हारा संकट दूर हो जाएगा। तुम्हारा गया हुआ राज्य भी तुम्हें मिल जाएगा।'

तब भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठर को एक कथा सुनाई। वह कहते हैं, 'बहुत समय पहले सुमंतु नाम के ब्राह्मण की परम सुंदरी सुशील कन्या थी। उस ब्राह्मण ने कन्या का विवाह कौण्डन्य ऋषि से कर दिया। कौण्डिन्य ऋषि विवाह के बाद जब आश्रम की ओर जा रहे थे तब रास्ते में ही रात हो गई। वे एक नदी के तट पर रुके।

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ब्राह्मण कन्या जिनका नाम सुशीला था उन्होंने देखा कि वहां बहुत सी स्त्रियां सुंदर-सुंदर वस्त्र धारण कर किसी देवता की पूजा कर रहीं थीं। सुशीला ने भी वहीं पूजन किया। व्रत का अनुष्ठान कर चौदह गांठों वाला डोरा अनंत अपने हाथ में बांधा और पति के पास आ गईं।'

कौण्डिन्य ऋषि ने जब उस अनंत के बारे में पूछा तो उन्होंने सारी बात बता दी। लेकिन वह प्रसन्न नहीं हुए। उन्होंने सुशीला के हाथ से वह डोरा तोड़कर अग्नि में जला दिया। यह अनंत जी का अपमान था। धीरे-धीरे कोण्डिन्य ऋषि दुखी रहने लगे और उनकी सारी संपत्ति भी नष्ट हो गई।

जब उन्होंने एक अन्य वरिष्ट ऋषि से इस बारे में पूछा तो उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से अनंत तोड़ देने वाली घटना का उल्लेख किया। उन्हें अपने किए पर बहुत पछतावा हुआ। उन्होंने अनंत चतुर्दशी के दिन विधि पूर्वक अनंत चतुर्दशी का व्रत किया और फिर अनंत अपनी भुजा में बांधा। उनकी परेशानियां दूर हो गईं।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, युधिष्ठिर अगर तुम भी यह व्रत करोगे तो तुम्हारा भी कल्याण हो जाएगा। इसी के साथ जो भी यह व्रत करेगा। वो परम धाम को प्राप्त होगा।

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