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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Apr 18, 2015 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

क्रोध, परेशानी के बीच युधिष्ठिर की सहनशीलता

कुछ इस तरह युधिष्ठिर अपने भाइयों को उत्तेजना कम कर सहनशीलता बनाए रखने का प्रयत्न करते थे।

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Publish Date: Sat, 18 Apr 2015 02:17:41 PM (IST)Updated Date: Tue, 28 Apr 2015 11:56:46 AM (IST)
क्रोध, परेशानी के बीच युधिष्ठिर की सहनशीलता

महाभारत एक ऐसा ग्रंथ हैं जिसमें आज के परिपेक्ष्य के लिहाज से काफी कुछ बेहतर जानकारी मिलती है। महाभारत में ऐसी कई कहानियों का उल्लेख मिलता है जो उस समय तो प्रसांगिक थी हीं, लेकिन आज भी उनकी महत्ता उतनी ही है जितनी पहले थी।

महाभारत के मुख्य पात्रों में से एक भीमसेन अक्सर उत्तेजित होकर बहस किया करते थे, लेकिन द्रोपदी का बहस करने का तरीका कुछ और ही था।

क्योंकि वह दुर्योधन और दुःशासन के जो अपमान उन्हें सहना पड़ा था। उस घटना याद वह बार-बार पांडवों को दिलाती थीं। वह शास्त्रों और पुराणों से ऐसे ऐसे तर्क देतीं कि द्रोपदी की बात सुनकर युधिष्ठिर भी हैरान हो जाते थे।


युधिष्ठिर ठंडी आह भरते और विचार करते कौरवों पर इन धार्मिक बातों का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसीलिए वह नीतिशास्त्र का सहारा लेते और अपनी विरोधी पक्ष की ताकत की तुलना करके भीम और द्रौपदी को समझाते।

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वह कहते, भूरिश्रवा, द्रोणाचार्य, भीष्म, कर्ण, अश्वत्थामा आदि बड़े-बड़े और उनके भाई कुशल योद्धा हैं। छोटे-बड़े कितने ही राजा दुर्योधन के पक्ष में चले गए हैं। भीष्म और द्रोणाचार्य हालांकि दुर्योधन को अधिक नहीं मानते हैं, फिर भी वे उसका साथ छोड़ेंगे ऐसा नहीं दिखाई देता।

वो युद्ध में दुर्योधन के लिए अपने प्राणों की आहुति भी दे सकते हैं। कर्ण भी महान योद्धा है। ऐसे में हमें कोई भी जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए।

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क्योंकि उतावली में काम बनते नहीं ज्यादातर मामलों में बिगड़ते ही हैं। कुछ इस तरह युधिष्ठिर अपने भाइयों को उत्तेजना कम कर सहनशीलता बनाए रखने का प्रयत्न करते थे।