
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। उत्तराखंड के चमोली जिले की खूबसूरत उरगम घाटी में स्थित 'बंसी नारायण मंदिर' पूरे देश में अपनी एक अनोखी परंपरा के लिए जाना जाता है। यह भव्य मंदिर पूरे साल बंद रहता है और केवल रक्षाबंधन (सावन पूर्णिमा) के दिन ही एक बार खुलता है। इस अवसर पर बहनें यहां आकर भगवान नारायण (विष्णु) को रक्षासूत्र (राखी) बांधती हैं और अपनी और अपने भाई की सुख-समृद्धि के लिए आशीर्वाद मांगती हैं।
यह मंदिर चमोली जिले की उरगम घाटी में नंदा देवी, त्रिशूल और नंदा घुंटी जैसी हिमालयी पर्वतमालाओं के मध्य स्थित है। इसके आसपास बांझ (Oak) और बुरांश (Rhododendron) के घने जंगल हैं। लगभग 8वीं सदी में निर्मित यह मंदिर करीब 10 फीट ऊंचा है। इसके गर्भगृह में भगवान विष्णु की चतुर्भुज/चौकोर शैली में बनी अत्यंत मनमोहक प्रतिमा स्थापित है।
इस मंदिर का सीधा संबंध भगवान विष्णु के वामन अवतार और पाताल लोक की कथा से जुड़ा हुआ है। जब दैत्यराज बलि का प्रभाव बहुत बढ़ गया, तब देवताओं की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया। उन्होंने बलि से तीन पग भूमि दान में मांगी। दो पगों में पूरी पृथ्वी और आकाश नापने के बाद जब तीसरा पग रखने के लिए जगह नहीं बची, तो राजा बलि ने अपना सिर आगे कर दिया।
भगवान विष्णु के पैर दबाने से राजा बलि पाताल लोक चले गए। लेकिन बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने भी उनके साथ पाताल लोक में रहकर उनका द्वारपाल बनना स्वीकार कर लिया।
लेकिन, जब भगवान काफी समय तक बैकुंठ वापस नहीं लौटे, तो चिंतित होकर माता लक्ष्मी नारद जी के पास गईं। नारद मुनि की सलाह पर माता लक्ष्मी ने सावन पूर्णिमा के दिन पाताल लोक जाकर राजा बलि को रक्षासूत्र बांधा और बदले में अपने पति भगवान विष्णु को पाताल लोक के बंधन से मुक्त कराया।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, राजा बलि के पाताल लोक से मुक्त होने के बाद भगवान नारायण जिस स्थान पर सबसे पहले धरती पर प्रकट हुए थे, वही स्थान 'बंसी नारायण मंदिर' है।
सावन पूर्णिमा के दिन सुबह मंदिर के कपाट खोले जाते हैं। इस दिन स्थानीय लोग और दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालु भगवान बंसी नारायण की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। बहनें भगवान को राखी बांधकर अपने परिवार की रक्षा का संकल्प लेती हैं और शाम को पूजा संपन्न होने के बाद मंदिर के कपाट फिर एक साल के लिए बंद कर दिए जाते हैं।
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