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बप्पा की पगड़ी में दिखता है होलकरों का राजसी अंदाज, 200 साल से गणेशजी को उसी रूप में सजा रहा खरगोनकर परिवार

खरगोनकर परिवार द्वारा तैयार की जाने वाली गणेश मूर्तियों की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि गणपति बप्पा के माथे पर होलकर राजघराने की पारंपरिक और शाही प...और पढ़ें

By Digital DeskEdited By: Navodit Saktawat
Publish Date: Mon, 14 Sep 2026 10:32:20 AM (IST)Updated Date: Mon, 14 Sep 2026 10:34:37 AM (IST)
बप्पा की पगड़ी में दिखता है होलकरों का राजसी अंदाज, 200 साल से गणेशजी को उसी रूप में सजा रहा खरगोनकर परिवार
होलकर रूप में गणेश जी की मूर्ति और कलाकार श्याम खरगोनकर

रामनाथ मुटकुळे, नईदुनिया, इंदौर। देश का सबसे स्वच्छ शहर और मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए एक अलग पहचान रखता है। यहां की उत्सव परंपरा भी अनूठी है। इंदौरवासी प्रत्येक उत्सव को धूमधाम से मनाते हैं। इंदौर की उत्सवप्रियता भी जग विख्यात है। यहां प्रत्येक उत्सव की सांस्कृतिक विरासत और गौरवशाली परंपरा का भी पूरा ध्यान रखा जाता है।

यहां होलकर राजवंश के समय की कई परंपराएं आज भी उतनी ही श्रद्धा और आस्था के साथ निभाई जाती हैं। ऐसी ही एक अनूठी और गौरवशाली परंपरा से जुड़ा है जूनी इंदौर का प्रसिद्ध खरगोनकर परिवार, जो 200 वर्षों से भी अधिक समय से यानी छह पीढ़ियों से गणेशोत्सव के दौरान भगवान गणेश की मूर्तियों को पारंपरिक होलकरकालीन स्वरूप में तैयार कर सजा रहा है।


होलकर राजघराने की पारंपरिक और शाही पगड़ी

होलकर राजवंश के परिवार में गणेशोत्सव के दौरान स्थापित की जाने वाली गणेशजी की मूर्ति को पारंपरिक रूप से ही तैयार किया जाता है।

खरगोनकर परिवार द्वारा तैयार की जाने वाली गणेश मूर्तियों की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि गणपति बप्पा के माथे पर होलकर राजघराने की पारंपरिक और शाही पगड़ी सुशोभित होती है।

भगवान गणेश को वैसी ही पगड़ी या फेटा पहनाया जाता है, जैसा होलकर राजवंश के राजा-महाराजा और परिवार के लोग धारण करते थे।

मूर्ति के वस्त्र, आभूषण और शृंगार भी पूरी तरह से मालवा के होलकर राजशाही ठाट-बाट के अनुरूप होते हैं। यही कारण है कि इस रूप में विराजने वाले गणेश जी को स्थानीय स्तर पर 'होलकरों के शाह' (राजपरिवार के गणेश) के रूप में भी जाना जाता है।

परंपरा की शुरुआत और छह पीढ़ियों का सफर

खरगोनकर परिवार के श्याम खरगोनकर बताते हैं कि इस ऐतिहासिक परंपरा की नींव परिवार के परदादा त्रियंबक राव खरगोनकर ने रखी थी।

उस समय यह परिवार होलकर राजघराने में कलाकारों के रूप में सेवा देता था। राज परिवार के उत्सवों कलाकृतियों को तैयार करना इनका मुख्य कार्य था।

समय बीतता गया, और उनके वंशजों ने आज भी इस कला को केवल जीवित ही नहीं रखा, बल्कि इसे एक जन-परंपरा के रूप में स्थापित कर दिया। परिवार की वर्तमान पीढ़ियां भी इसी विरासत को पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ा रही हैं।

पारंपरिक तरीके से निर्माण और इको-फ्रेंडली स्वरूप

खरगोनकर परिवार भगवान गणेश की मूर्तियों के निर्माण के लिए हमेशा शुद्ध और पारंपरिक पीली मिट्टी का ही उपयोग करते हैं।

आधुनिक दौर में प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) की मूर्तियों के चलन के बावजूद इस परिवार ने कभी अपनी इस परंपरा से समझौता नहीं किया।

मूर्तियों को रंगने के लिए भी पूरी तरह से इको-फ्रेंडली रंगों का ही इस्तेमाल किया जाता है।

इसके अलावा, मूर्तियों को हल्का और सुविधाजनक बनाने के लिए उन्हें अंदर से कलात्मक रूप से खोखला बनाने के प्रयोग भी किए गए हैं, ताकि पालकी यात्रा के दौरान इन्हें आसानी से ले जाया जा सके।

राजवाड़ा तक निकलती है भव्य पालकी यात्रा

गणेश चतुर्थी के पावन पर्व पर खरगोनकर परिवार द्वारा निर्मित इस विशेष राजसी गणपति प्रतिमा को सजाया जाता है। पारंपरिक गाजे-बाजे, ढोल-ताशों और राजशाही लवाजमे के साथ बप्पा को पालकी में विराजित कर शहर के ऐतिहासिक राजवाड़ा तक लाया जाता है। यह यात्रा इंदौर की सांस्कृतिक शोभा और होलकर राजशाही की यादों को आज भी ताजा कर देती है।

पांच दिन होती है पूजा

होलकर राज के समय भगवान गणेश की मूर्ति को खरगोनकर परिवार के यहां से पालकी में धूमधाम और राजशाही लवाजमे के साथ लाया जाता था, बाद में भगवान गणेश को बग्घी में विराजित कर लाया जाने लगा। आज भी पूरे धूमधाम से भगवान गणेश की मूर्ति लाकर पारंपरिक विधिविधान से विराजित की जाती है।

हालांकि प्राचीन भव्यता का स्वरूप छोटा हो गया है, बावजूद इसके सांस्कृतिक विरासत और परंपरा आज भी कायम है। राजशाही के समय राजवाड़ा में भगवान गणेश जी की बड़ी मूर्ति विराजित की जाती थी, साथ ही होलकर परिवार के देवघर में बप्पा की एक छोटी मूर्ति विराजित कर इनकी विधिविधान से पूजा की जाती थी।

होलकर राजवंश में भगवान गणेश की मूर्ति पांच दिन के लिए विराजित की जाती है। पांच दिनों तक विधिविधान से पूजा के बाद बप्पा की मूर्ति को विसर्जित किया जाता है।

धार्मिक विधान और निर्माण की शुरुआत

इस परिवार में मूर्तियों के निर्माण का कार्य भी अत्यंत पवित्र और ज्योतिषीय मुहूर्तों के अनुसार होता है। परंपरा के अनुसार, हर साल बसंत पंचमी के शुभ अवसर पर विधि-विधान और पूजा-पाठ के साथ तीन छोटी गणेश प्रतिमाओं का निर्माण कर 'अथर्वशीर्ष' के पाठ के साथ उनका पूजन किया जाता है, जिसके बाद ही बड़े पैमाने पर मूर्तियों के निर्माण का कार्य प्रारंभ होता है। खरगोनकर परिवार की यह अनूठी परंपरा इस बात का प्रमाण है कि इंदौर के लोग आज भी अपनी दो सदी पुरानी होलकरकालीन संस्कृति और इतिहास को अपने दिल में संजोए हुए हैं।