
महाभारत में शाल्व( शिशुपाल का मित्र) द्वारा द्वारका के घेरे जाने का जो वर्णन है, उसे पढ़ते हुए ऐसा भ्रम हो जाता है कि कहीं हम आजकल की लड़ाई का तो वर्णन नहीं पढ़ रहे। उन दिनों के युद्ध की कार्रवाइयां और तरीके ठीक आज की ही तरह मालूम होते हैं।
द्वारिका का किलेबंद नगर एक टापू पर बसा था। शत्रु के आक्रमण से बचाव के लिए हर प्रकार का बंदोबस्त किया गया था। दुर्ग की बनावट ही ऐसी थी कि उसमें हजारों सैनिक सुरक्षित रहकर लड़ सकते थे। दुर्ग पर ऐसे दुर्लभ यंत्र लगे हुए थे। जमीन खोदकर कई सुरंग बनाई गईं थीं।
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किले के अंदर तरह-तरह के हथियारों, पत्थर फेंकने वाली मशीन, बारूद के गोदाम थे। सैनिकों के कई दल दुर्ग के अंदर पहले से ही तैयार रहते थे और कितने ही जवान नए सिरे से भर्ती किए जाते थे।
एक बार शाल्व को जब खबर मिली श्रीकृष्ण के हाथों शिशुपाल मारा गया है तो उससे रहा नहीं गया। उसने द्वारिका पर चढ़ाई कर दी। और नगर को चारों तरफ से घेर लिया। श्रीकृष्ण इंद्रप्रस्थ से लौटे नहीं थे। इस कारण राजा उग्रसेन ने द्वारिका में युद्ध की कमान संभाली।
शत्रु के घेरा डालते ही उग्रसेन ने डौंडी पटवा दी कि नगर के अंदर ताड़ी जैसी नशीले पेय पदार्थ का सेवन करने से मना है। साथ ही नट-नटनियों और तमाशा दिखाने वालों को भी शहर से बाहर कर दिया जाए। जहां कहीं भी समुद्र पार करने के पुल हैं उन्हें तोड़ दिया जाए। जहाजों को रोक दिया जाए। किले के चारों ओर की खाइयों में सूलियां लगा दी जाएं।
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वैसे द्वारिका नगरी दुर्गम स्थान पर बनी हुई थी। लेकिन शाल्व के घेरा डालने के बाद उसको और भी सुरक्षित करने का प्रबंध कर दिया गया। लोगों के आने-जाने पर सख्त पाबन्दियां लगा दी गईं। मुहर लगे हुए अनुमति पत्र के बगैर शहर से न कोई तो बाहर जा सकता था और न ही आ सकता था। सैनिकों का वेतन बड़ा दिया गया और नियत समय पर दिया जाने लगा। इस तरह द्वारिका सभी तरह से सुरक्षित थी।
जब भगवान श्रीकृष्ण को पता चला की शाल्व ने द्वारिका पर चढ़ाई करने के कारण द्वरिका वासी लोगों को परेशानी हुई तो उन्होंने सौभदेश पर चढ़ाई कर दी और शाल्व को बुरी तरह से परास्त किया।