गंगा नदी को पृथ्वी पर लाने के लिए इच्छाकुवंशी राजा भगीरथ ने कठोर तप किया था। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर माता गंगा, भगवान शिव की जटा से निकलकर पृथ्वी पर अंश मात्र अवतरित हुईं। इसीलिए उत्तर भारत में गंगा भगीरथी के नाम से प्रसिद्ध है।
लेकिन दक्षिण में गंगा को पृथ्वी पर लाने का श्रेय महर्षि गौतम को जाता है। उन्हीं के नाम पर दक्षिण में गंगा को गौतमी (गोदावरी) गंगा कहा जाता है। इस बात का विस्तृत उल्लेख ब्रह्म पुराण में मिलता है।
इस पुराण में पुण्यमय गंगा के दोनों स्वरूपों का विस्तृत वर्णन है। और पृथ्वी पर दो गंगाओं के भ्रम को दूर किया गया है। ब्रह्म पुराण में गौतमी( गोदावरी) गंगा के तट पर स्थित अधिकांश तीर्थों का बहुत ही मनमोहक दर्शन विभिन्न काव्य ग्रंथों में किया गया है।
ब्रह्म पुराण में वर्णित तीर्थों के नाम
वराह तीर्थ, भानु तीर्थ, अरुणा-वरुणा संगम, कपोत-कपोती तीर्थ, गरुड़ तीर्थ, गोवर्धन तीर्थ, श्वेत तीर्थ, शुक्र तीर्थ, इंद्र तीर्थ, अग्नि तीर्थ, इला तीर्थ, सुपर्णा-संगम तीर्थ, शमी तीर्थ, शनैश्चर तीर्थ, सोम तीर्थ, धान्य तीर्थ,गोविंद तीर्थ, पुत्र तीर्थ, तपस्तीर्थ, लक्ष्मी तीर्थ, सारस्वत तीर्थ, भद्र तीर्थ, व्यास तीर्थ, चक्षु तीर्थ, विप्र तीर्थ, नृसिंह तीर्थ, पैशाचनाशन तीर्थ, कुशतर्पण तीर्थ, पुरुषोत्तम तीर्थ, श्री विष्णु तीर्थ, आदि तीर्थों का वर्णन इस पुराण में है।