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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे May 28, 2014 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

मंदिर जिसमें कभी चांदी बेचकर बनाया जाता था घृत मंडल

कहते हैं कि 50 साल पहले मंदिर के पुजारियों को देसी घी के लिए मंदिर की चांदी को बेचना पड़ता था।

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Publish Date: Wed, 28 May 2014 05:25:38 PM (IST)Updated Date: Fri, 30 May 2014 09:13:41 AM (IST)
मंदिर जिसमें कभी चांदी बेचकर बनाया जाता था घृत मंडल

कांगड़ा में बज्रेश्वरी देवी मंदिर में लाखों-करोड़ों रुपए की चांदी चढ़ाई जाती है, एक दिन ऐसा भी था जब चांदी बेचकर घृत मंडल( घी का प्रसाद) बनाया जाता था।

कहते हैं कि 50 साल पहले मंदिर के पुजारियों को देसी घी के लिए मंदिर की चांदी को बेचना पड़ता था, जिससे घृत पर्व का आयोजन हो सके।

प्राचीन काल से शुरू हुई घृत पर्व की परंपरा आज भी जारी है, परंतु गुजरे वक्त में संसाधनों की कमी के बावजूद मंदिर के पुजारियों को ही घृत पर्व के लिए देसी घी का इंतजाम करना पडता था। यहां तक कि कई बार मंदिर की चांदी को बेच कर देसी घी को खरीदा गया।

करीब पचास साल पहले घृत पर्व का आयोजन कैसे किया जाता था। यहां एक स्थान पर भट्टी बनी हुई थी वहां देसी घी को पिघलाने का कार्य हुआ करता था।

देसी घी के लिए कुएं से पानी लाने के लिए एक व्यक्ति को कार्य पर लगाया जाता था। जिससे पानी में देसी घी को रगड़ने से मक्खन तैयार किया जा सके, लेकिन आज पानी का इंतजाम मोटर से हो रहा है।


घृत पर्व के लिए 1989 में पहली बार जागरण का आयोजन किया गया, जिससे लोगों को इस परंपरा का जानकारी मिली और लोगों की आस्था बढ़ी। इस आयोजन के बाद मंदिर में जागरण का आयोजन होने लगा और श्रद्धालुओं द्वारा देसी घी दान में देने के लिए आगे आने लगे।

जब भगवती जागरण के आयोजन से घृत पर्व के आयोजन की जानकारी दूर-दूर तक पहुंची, जिससे अब क्विंटल के हिसाब से मक्खन का लेप माता पर किया जा रहा है।