
- वंदना अवस्थी दुबे
हमारा देश त्योहारों का देश है। कुछ तो जगजाहिर त्योहार हैं, कुछ ऐसे त्योहार भी हैं, जो अपने क्षेत्र विशेष के लिए तो बहुत महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनकी राष्ट्रीय परिदृश्य पर कोई चर्चा नहीं होती।
असल में इस तरह के त्योहार, किसी न किसी बड़े त्योहार का ही अहम हिस्सा होते हैं। जैसे ब्रज और राजस्थान में अन्नाकूट, बुंदेलखंड में होली के कई दिन पहले से ग्वालटोला आल्हा गाने लगते हैं। ये भी एक उत्सव की तरह ही होता है, और बुंदेलखंड का नौरता, जो कि नवरात्र के साथ शुरू होता है।
नौरता यानि नौ रातें यानि नौ दिन तक चलने वाला उत्सव। जी हां, बुंदेलखंड का ये एक बेहद उल्लासपूर्ण लोकोत्सव है। एक ऐसा त्योहार, जो केवल बेटियों के लिए निर्धारित है। जिसमें केवल बेटियां भाग लेती हैं। इस उत्सव में बेटों का कोई स्थान नहीं।
आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से पूरे नौ दिन तक ब्रह्म मुहूर्त में संपन्न किया जाने वाला ये एक ऐसा उत्सव है, जिसमें बुंदेलखंड की हर बेटी भाग लेती है। इधर, नवरात्रों का प्रारंभ हुआ, उधर उसी सुबह से नौरता का आगाज हो जाता है।
इस उत्सव को मनाने के लिए कुंआरी लड़कियां दस दिन पहले से ही तैयारी शुरू कर देती हैं। अब तो रंगोली के रंग बाजार में बहुतायत मिलने लगे हैं, वरना पहले लड़कियां सफेद पत्थर इकट्ठे करती थीं फिर उनको कूट-पीस के महीन पावडर बनाती थीं।
इस पावडर के कई हिस्से कर उन्हें अलग-अलग रंगों से रंग के रंगोली के रंग बनाए जाते थे। मोहल्ले का कोई एक ऐसा घर चुना जाता है जिसके बाहर काफी जगह हो। इतनी जगह कि कम से कम ये लड़कियां एक साथ अपने-अपने खानों में रंगोली बना सकें।
इस तरह होती है तैयारी
त्योहार के एक दिन पहले जिस स्थान पर नौरता खेलना होता है, उस स्थान पर लड़कियों की संख्या के हिसाब से चौखाने बना लिए जाते हैं। ये कम से कम दो फुट चौड़े और दो फुट लंबे वर्ग होते हैं। इनके किनारे खड़िया मिट्टी से लकीरें खींच के इन्हें विभाजित किया जाता है। हर लड़की अपना चौखाना गोबर से लीपती है। खेल के स्थान पर ही दीवार पर सूरज, चंदा और हिमांचल की तस्वीरें काली मिट्टी से बनाकर चिपकाई जाती हैं।
बेढब राक्षस भी बनाते हैं रंगोली से
रंगोली बनाने का क्रम सुबह चार बजे से शुरू हो जाता है और करीब साढ़े पांच या छह बजे तक खत्म होता है। जब सबकी रंगोली बन जाती हैं, तब बचे हुए रंगों को लेकर लड़कियां सड़क पर बड़ी दूर तक जाती हैं और बीच सड़क पर उन्हीं बचे हुए रंगों से एक बेढब-सा राक्षस बनाकर उसे पलट के देखे बिना भाग आती हैं।
फिर सबकी अपनी-अपनी दिनचर्या शुरू। आठ इन तक यही क्रम चलता है। आठवें दिन शाम को लड़कियां एक बहुत से छेद वाली मटकी में दिया जलाकर रखती हैं और उन सभी घरों में जाती हैं जहां की बेटियां नौरता में शामिल थीं।
फिर गाती हैं बहुत मधुर गीत-'पूछत-पूछत आए हैं, नारे सुअटा कौन बड़े जी की पौर' गाते हुए हर दरवाजे पर पहुंचती हैं। असल में ये चंदा एकत्र करने और न्योता देने जैसा काम है।
लोग जितना चाहते हैं उतनी राशि देते हैं। इस एकत्रित पैसे का इस्तेमाल आखिरी दिन होने वाली पूजा का इंतजाम और आने वालों को प्रसाद वितरण में किया जाता है। नौवीं रात को नौरता स्थल पर ही पूजन होता है।
आने वालों को लड्डुओं का प्रसाद दिया जाता है। इसके बाद शुरू होता है नौरता खेलने वाली बेटियों का आयोजन। चूंकि नौरता शहर के हर मोहल्ले में खेला जाता है तो सभी नौरता समूह अपनी गौर की तारीफ करते हुए दूसरी गौर का मजाक बनाते हैं। ये सब भी मनोरंजन का ही एक हिस्सा है और लड़कियां गाती हैं- 'परायी गौर की आंय देखो झांय देखो,का पैरें देखो, नाक नकटी देखो,आंख कानी देखो, कान बूचौ देखौ, फटी चुनरिया देखो'
इस गाने का कोई अंत नहीं होता क्योंकि अपने आप इसमें गौर के वर्णन जोड़े जाते हैं। अब बारी आती है अपनी गौर की- ' हमायी गौर की आंय देखौ-झांय देखौ का पैरें देखो,नाक नथनी देखो हाथ कंगन देखो, पैरौं पायल देखो'
दावत में कहते हैं 'हप्पू'
इस जवाबी कार्रवाई के बाद दावत शुरू होती है। दावत के लिए सभी लड़कियां अपने-अपने घरों से पकवान लाती हैं और हर कौर पर 'हप्पू' बोल के खाती जाती हैं। अंत में सूरज, चंदा और हिमांचल का जल में विसर्जन कर इस बेहद रंगीन, गरिमामयी त्योहार का समापन होता है और लड़कियां फिर इंतजार करने लगती हैं, अगली नवरात्रि का..इस त्योहार में आप बुंदेलखंड के किसी भी हिस्से में चले जाएं, रंगोली से घर की दहलीज रंगीन मिलेगी। यहां उत्सव के रंग आपका स्वागत करते मिलेंगे तो कुछ दिन तो गुजारिए बुंदेलखंड में।
दीवार पर उकेरते हैं सूरज-चंदा
तो ये सारी तैयारी उस घर की बड़ी महिलाएं कर देती हैं, जिस घर के सामने नौरता खेला जाना है। पहले दिन सुबह लगभग तीन बजे लड़कियां उठकर नौरता वाले स्थान को एक बार फिर साफ करती हैं।
एक कलश और एक स्थायी थाली तैयार की जाती है। इसी थाली से रोज दीवार पर उकेरे गए सूरज-चंदा की आरती होती है। थाली में सिंदूर, हल्दी, चावल, फूल और दूब रखे होते हैं। तभी महिलाएं एकदम विभोर होकर गाना शुरू करती हैं-
'नाय हिमांचल जू की कुंअर लड़ायतीं नारे सुअटा गौरा देवी क्वांरे में नेहा तोरा चंदामल के घुड़ला छूटे सूरजमल के घुड़ला छूटे' इस गीत से जाहिर होता है कि जब बेटियां पार्वती की शरण में गईं, तब गौरा भी कुआंरी ही थीं।
गीत और आरती के खत्म होते ही लड़कियां अपने-अपने खानों में रंगोली बनाती हैं। एक से बढ़कर एक रंगोलियां रंगों का ऐसा अद्भुत संसार जो बस कल्पनाओं में होता है।
लड़कियां रोज नई रंगोली सीख के आती हैं और नई-नई आकृतियां उकेरती हैं साथ ही गीत गाती हैं-तिल के फूल, तिली के दाने, चंदा ऊगे बड़े भिनसारे, उगई न हो बारे चन्दा, हम घर होय लिपना-पुतना सात न होय, दे दे झरियां ननद न होय चढ़ै अटरियां'
अद्भुत है यह उत्सव
ये उत्सव मुख्य रूप से अविवाहित बेटियों का है। कहा जाता है कि 'सुअटा' नाम का एक राक्षस था, जो कुंआरी कन्याओं को खा जाता था। इस राक्षस से बचने के लिए सभी बेटियों ने नवरात्रि में माता पार्वती की आराधना की और उन्होंने सभी बच्चियों को सुरक्षित कर लिया, और दैत्य को भस्म कर दिया।
ऐसे राक्षस के अंत और सुअटा के भस्म होने की खुशी में आज भी बुंदेलखंड की बेटियां नौरता का आयोजन करती हैं जो बेटियों द्वारा सृजित एक ऐसा रंग-बिरंगा संसार है, जिसमें व्यवस्था है, संस्कार हैं, और बुंदेली गरिमा है।
इस त्योहार के माध्यम से बेटियां गीत-संगीत, नृत्य, चित्रकला, मूर्तिकला और साफ-सफाई का अद्भुत समन्वय करती हैं।