
- देवदत्त पटनायक
किसी अविवाहित के मुंह से हनीमून शब्द सुनना असभ्य लग सकता है। लेकिन यह शब्द नव विवाहितों के लिए अपने आप में कोमलता, उत्सुकता और अपेक्षा से पूरी तरह भरा है।
यह शब्द 16 वीं शताब्दी में अंग्रेजी वाक्यांश होनी मूने से लिया गया था। शुरुआती 19 वीं शताब्दी में उच्च वर्गीय अंग्रेज परिवारों ने इसे संस्थागत बनाया जब अधिकांशत: परिवार और मित्रों के साथ वर और वधू उन बुजुर्गों की जमीन-जायदाद देखने के लिए जाते थे जो उनके विवाह में सम्मिलित नहीं हो पाए हों।
यह प्रथा फिर योरप में भी प्रचलन में आई और इसे 'द इंग्लिश स्टाइल वॉयेज' यानी अंग्रेजों के अंदाज की यात्रा कहा जाने लगा। पहले विश्वयुद्ध के शुरू होने से पहले के समय में जिसे गोल्डन एज कहा जाता है यह टूरिज्म का एक तरीका बन गया और उसके बाद तो विश्व के अनेक हिस्सों में यह एक कायदा ही बन गया।
यहीं से यह शब्द अधिकांश क्षेत्रीय भाषाओं में अनुदित भी किया गया। उदाहरण के लिए मराठी में मधु-चंद्र यही बताता है कि हनीमून एक सार्वभौमिक दस्तूर बन गया है। या तो लोग विवाह की रस्मों के पूरा होने के तुरंत बाद हनीमून के लिए जाते हैं और इसी समय में सुहागरात भी शामिल रहती है या फिर विवाह के कुछ दिनों बाद हनीमून पर जाते हैं और करीब एक महीना साथ बिताते हैं।
हनी शब्द का आशय एकदूसरे को खोजने के इस समय के दौरान की मधुरता से है और मधुमक्खियों के लिए यह सहवास की एक सामान्य उपमा भी है। लेकिन चंद्रमा? यह संभवत: उस पहले चंद्र मास से संबंधित है जिसके दौरान वर वधू के पहले मासिक धर्म की जानकारी पाता है।
मासिक धर्म वह समय है जबकि सहवास की अनुमति नहीं रहती है। अगर वे दोनों सौभाग्यशाली हुए तो यह बीच में नहीं पड़ता और दस चंद्र मास के बाद बालक का जन्म होता है। आज जिस तरह की निजता और फूहड़ता को हमने मधुर मिलन के साथ जोड़ दिया है वह पहले की ग्राम संस्कृति और कृषि आधारित समुदाय में नहीं थी और यह जीवन का एक हिस्सा था जो कि जनजातीय जीवन के अस्तित्व के लिए बहुत महत्वपूर्ण था।
प्राचीन सेमीटिक जनजाति (दक्षिण पश्चिम एशिया के लोगों का समूह जिनमें अरब और यहूदी शामिल हैं) में वर से अपने पुरुष संबंधियों के सामने वधू के शरीर से पुष्प हटाने की अपेक्षा रहती थी ताकि वधू अपना कौमार्य सिद्ध कर सके। बाद के समय-समय पर कौमार्य सिद्ध करने के और भी तरीके चलन में रहे। विश्व के अधिकांश हिस्सों में बच्चों का वयस्क होने से पहले ही विवाह कर दिया जाता था। भारत में ऐसी स्थिति में लड़की अपने माता-पिता के घर ही रहती थी जब तक कि उसका गौना नहीं हो जाता था जिसमें कि वर उसे वयस्क होने पर अपने साथ ले जाने के लिए लेने आता था।
विवाह परंपरा और यहां तक कि गौना, साथ पहली रात मनाए जाने से पूरी तरह अलग थी और यह वधू को मौका देती थी कि वह अपने नए घर से पूरी तरह परिचित हो जाए। गृह सूत्र में या गृहस्थ आश्रम के नियमों के बारे में वैदिक ग्रंथों में स्पष्ट रूप से विवाह संस्कार और गर्भाधान संस्कार (जबकि स्त्री और पुरुष का मिलन होता है) का उल्लेख है।
भारतीय विवाह परंपराओं में बहुत से ऐसे तत्व हैं जो वर और वधू को एकदूसरे से परिचित होने का मौका देते हैं। यह परिचय सामान्यत: कुछ खेलों के साथ भी किया जाता है जिसमें एकदूसरे की कलाई पर बंधे धागों को खोलना, एक दुग्ध पात्र में अंगूठियों को ढूंढना, एक झूले पर बैठना जिसे मित्रों द्वारा झूला दिया जाता है, एक ही थाली में भोजन करना, ऐसे गीत गाना जिसमें एकदूसरे का नाम आता हो, शामिल हैं।
संभवत: सबसे महत्वपूर्ण रस्म वह है जिसके दौरान वर वधू से आकाश में अरुंधती तारा चिह्नित करने को कहता है। अरुंधति प्रसिद्ध वैदिक ऋषि वशिष्ठ की पत्नी थीं। इस खेल में वधू को उसकी सहेलियां सलाह देती हैं कि वह गलत तारा चिह्नित करे ताकि वर को मौका मिले कि वह उसका हाथ पकडकर उसकी अंगुली को सही तारे की ओर ले जा सके। इस दौरान दोनों के बीच सामीप्य होता है और प्रेम की कोमलता जीवन में आती है।
यह लोकप्रिय कॉलम जागरण समूह के 'मिड-डे' से