
धर्म डेस्क। महाभारत की कथा जब भी मित्रता के सन्दर्भ में सुनी जाती है, तो कृष्ण-सुदामा के साथ-साथ कर्ण-दुर्योधन का नाम भी सम्मान से लिया जाता है। कर्ण और दुर्योधन की मित्रता इस बात का जीवंत प्रमाण है कि एक सच्चा मित्र केवल सुख में ही नहीं, बल्कि विनाश के द्वार पर भी साथ खड़ा रहता है। कर्ण भली-भांति जानते थे कि दुर्योधन अधर्म के पथ पर है, फिर भी उन्होंने अंत तक अपनी वफादारी नहीं छोड़ी।
महाभारत के प्रसंग के अनुसार, रंगभूमि में शस्त्र-प्रदर्शन के दौरान जब कर्ण ने अर्जुन को चुनौती दी, तब कृपाचार्य ने कर्ण के कुल (सूत-पुत्र) को लेकर उन्हें अपमानित किया। नियम के अनुसार, बिना राजा हुए कोई राजकुमार से द्वंद्व नहीं कर सकता था।
उस समय जब पूरी सभा मौन थी, तब दुर्योधन ने आगे बढ़कर कर्ण की योग्यता का सम्मान किया और उन्हें अंग देश का राजा घोषित कर दिया। उस दिन दुर्योधन ने न केवल कर्ण को एक राज्य दिया, बल्कि वह सम्मान भी दिया जिसे समाज उनके कुल के आधार पर नकार रहा था। इसी उपकार और सम्मान के बदले कर्ण ने अपना संपूर्ण जीवन दुर्योधन को समर्पित कर दिया।
कथा के अनुसार, युद्ध से ठीक पहले भगवान श्रीकृष्ण ने कर्ण को एकांत में बुलाया और उनके जन्म का रहस्य उजागर किया। कृष्ण ने बताया कि कर्ण वास्तव में कुंती के पुत्र और पांडवों के ज्येष्ठ भ्राता हैं।
यह भी पढ़ें- Mangalwar Tips: नए साल का पहला मंगलवार, हनुमान जी की पूजा से दूर होंगे सभी कष्ट, जानें पूजा विधि
कर्ण ने भगवान कृष्ण की बात सुनकर विनम्रता से कहा कि भले ही पांडव उनके सगे भाई हैं, लेकिन जिस समय पूरी दुनिया उन्हें 'सूत-पुत्र' कहकर तिरस्कृत कर रही थी, उस समय केवल दुर्योधन ने ही उन पर विश्वास जताया। कर्ण ने कहा, "हे केशव! यदि आज मैं सत्ता के लालच में दुर्योधन को छोड़ देता हूँ, तो इतिहास मुझे एक कृतघ्न मित्र के रूप में याद रखेगा।"
कर्ण की इस निष्ठा को देखकर स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण भी अभिभूत हो गए। उन्होंने कर्ण के समर्पण की सराहना करते हुए कहा कि ऐसा मित्र पाना सौभाग्य की बात है और युगों-युगों तक इस मित्रता की मिसाल दी जाएगी।
अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। नईदुनिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। नईदुनिया अंधविश्वास के खिलाफ है।