
कुल्लू का दशहरा पुरे देश में प्रसिद्ध है। कुल्लू नगर में देवता रघुनाथजी की वंदना से दशहरा उत्सव का आरंभ होता हैं। दशमी के दिन इस उत्सव की शोभा निराली होती है। इस दशहरे की खास बात यह है कि जब पूरे देश में दशहरा खत्म हो जाता है, तब यहां शुरु होता है।
देश के बाकी हिस्सों की तरह यहां दशहरा रावण, मेघनाथ और कुंभकर्ण के पुतलों का दहन करके नहीं मनाया जाता। सात दिनों तक चलने वाला यह उत्सव हिमाचल के लोगों की संस्कृति और धार्मिक आस्था का प्रतीक है।
हिमाचल प्रदेश का शहर कुल्लू इतना सुंदर है कि उसका वर्णन करना शब्दों में नहीं किया जाता है। जहां नजर दौड़ाइए वहां आपको साफ नीला आकाश और वर्फ की चादर ओढ़े पर्वत दिखाई देंगे। कुल्लू जिसे देवताओं की घाटी भी कहते हैं यहां मनाया जाने वाला कुल्लू दशहरा दुनिया भर में प्रसिद्ध हो चुका है।
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कुल्लू का प्राचीन नाम कुलंतपीठ है। जिसका अर्थ है संसार की सभ्यता का अंतिम पड़ाव। कुल्लू में करीब 2000 कुलदेवताओं की पूजा बडे ही धूमधाम से की जाती है। व्यास नदी के किनारे बसा कुल्लू प्राचीन काल में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का केंद्र हुआ करता था।
ऐसे शुरू होता है कुल्लु का दशहरा
कुल्लू के आस-पास के सभी कुल देवियां/देवता कुल्लू के दशहरा मैदान में आते हैं। उन्हें भक्त पालकियों में लाते हैं। लोकदेवी या लोकदेवता स्थानीय लोगों की भावना का प्रतीक होते हैं। कुल्लू के दशहरा मैदान में यह सभी पालकियां बहुत ही बड़े स्तर पर आती हैं। इस उत्सव को हिमाचल सरकार ने राज्यस्तरीय उत्सव का दर्जा दिया है। इस मौके पर विशेष रूप से बंदोबस्त किया जाता है।
इतिहास: कुल्लू के इस दशहरे की शुरूआत 17वीं शताब्दी में हुई थी। कहा जाता है उस समय के राजा जगत सिंह एक बार मणिकर्ण तीर्थ की यात्रा पर निकले थे। यह हिमाचल प्रदेश का मुख्य तीर्थ स्थल है। जो कि अपने गर्म पानी के कुंड के लिए प्रसिद्ध है।
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यात्रा के दौरान राजा को बताया गया कि पास ही के गांव में किसी ग्रामीण के पास बेशकीमती धन का खजाना है। उस व्यक्ति का नाम दुर्गादत्त था। राजा के मन में उस खजाने की चाह जाग उठी। और उन्होंने उस खजाने को लाने के लिए भेज दिया। सच्चाई यह थी उसके पास कोई खजाना नहीं था। राजा के सिपाहियों ने दुर्गादत्त के साथ मारपीट की, और कहा राजा तीर्थयात्रा से लौटकर आएंगे तब तक खजाना का पता चल जाना चाहिए।
दुर्गादत्त परेशान हो गया। तब उसने अपने घर को आग से जला कर खुद भी परिवार के साथ जलकर राख हो गया। राजा जगत सिंह को जब इस बारे में पता चला तो वो परेशान हो गए। तब राजा ने एक गुरू की शरण ली।
गुरु ने उपाय सुझाया कि यदि अयोध्या से श्रीराम की गोपनीय तरीके से मूर्ति लाकर कुल्लू में स्थापित की जाए और उसकी पूजा की जाए। अयोध्या से मूर्ति को लाया गया। उनकी पूजा के बाद उन्हें कुल्लू को वास्तविक राजा घोषित किया गया और राजा जगत सिंह उप राजा कहलाए। दुर्गादत्त ब्रह्माण था। तब कहीं राजा के सिर से ब्रह्महत्या का पाप हटा।
श्रीरघुनाथ जी का जो विग्रह यहां स्थापित किया गया वो श्री रघुनाथ विग्रह कहा जाता है। इसका निर्णाण 1637-1662 के मध्य बताया गया है। कुल देवी और देवताओं की प्रतिमाएं एक बार दशहरा मैदान में जाने से पहले यहां अवश्य लाई जाती हैं।
राजा के वंशज करते हैं पूजा
कुल्लू के दशहरा मैदान में भीड़ इतनी अधिक होती है। कि यहां पैर रखना भी मुश्किल होता है। कुल्लू के दशहरे में महाराज जगतसिंह के वंशज मुख्य अतिथि होते हैं। और पूजा अर्चना का शुभारंभ इन्हीं के द्वारा होता है। महाराज के वंशज अपने पारंपरिक परिधानों में होते हैं।
दशहरा उत्सव यहां मेले का रूप धारण कर लेता है। उनके आदर्शों के अपनाने की सीख देती यह यात्रा बेहद रोमांचक होती जाती है। विजयादशमी से शुरू होने वाला यह दशहरा इसी गर्मजोशी से चलता रहता है। यहां 40 प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान किए जाते है। यहां भगवान रघुनाथ की यात्रा का विशेष महत्व होता है। इस शोभायात्रा का नेतृत्व पारंपरिक रूप से महाराज जगतसिंह के वंशज करते आए हैं।
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इस तरह कुल्लू का दशहरे का समापन करीब आता है। मान्यता है कि जब तक में अन्य लोक देवियों और देवताओं समेत ऱघुनाथ जी पालकी के हिडिम्बा मंदिर के यहां तक न जाए तब तक यह यात्रा अधूरी मानी जाती है। माता हिडिम्बा का वर्णन महाभारत में मिलता है जिनका पुत्र घटोत्कच था।
इस तरह अक्टूबर में दशहरे के दिन से शुरू होने वाला कुल्लू का दशहरा उत्सव, सात दिनों तक चलने के बाद समाप्त हो जाता है। वहीं, सभी देव और देवियों की प्रतिमाएं मंदिर में पुनः स्थापित कर दी जाती हैं।