
पांच सौ साल पहले दक्षिण से उत्तर का सफर तय करती हुई उत्तर प्रदेश में कान्हा की नगरी यानी वृंदावन पहुंची ये पवित्र आग की अमर कहानी है।
अमर इसलिए कि जलने के बाद ये कभी नहीं बुझी। आंधी, पानी, बारिश के साथ-साथ वक्त के उतार-चढ़ाव देखे, मगर ये आग कभी सुलगी तो कभी लौ के रूप में जलती रही।
आस्था के केंद्र श्री राधारमण मंदिर में अबाध रूप से जल रही है। इसी अग्नि से दीप प्रज्जवलित होता है और इसी से बनता है ठाकुर जी का प्रसाद।
कान्हा की नगरी मथुरा के वृंदावन में श्रीराधा रमण जी का मंदिर है। सप्त देवालयों में शामिल यह मंदिर श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र बना हुआ है।
मान्यता है कि चैतन्य महाप्रभु के शिष्य गोपाल भट्ट श्रीराधारमण मंदिर में आज से करीब पांच सौ साल पहले दक्षिण भारत के तमिलनाडु में श्रीरंगपट्टनम स्थित श्रीरंगम मंदिर से इस अग्नि को लेकर वृंदावन आए थे।
श्रीगोपाल भट्ट के पिता वेंकट भट्ट श्रीरंगम मंदिर के सिद्ध पुजारी थे। उन्होंने वहां जलने वाले दीप की अग्नि को अपने पुत्र को दिया। जिसे दीप के रूप में वे यहां लाए।
इस अग्नि को सिद्ध ज्योति मान रसोईघर में सुरक्षित तरीके से प्रज्जवलित किया गया। तब से लेकर अब तक पवित्र आग जल रही है। परंपरा के अनुसार बाहर से तैयार किए गए व्यंजन से ठाकुरजी को भोग लगाने पर प्रतिबंध है। इस परंपरा का आज भी पालन किया जा रहा है। पवित्र आग से ही भोजन बनता है।
आग का कारवां
पांच सौ वर्ष पूर्व श्रीगोपाल भट्ट संतों के साथ तमिलनाडु से मटके में जलता हुआ दीपक लेकर चले थे। दीपक के साथ कोयला भी रखा गया था, ताकि आग बुझ न पाए। रास्ते में जहां भी संतों का पड़ाव डलता, वहां इसी आग से भोजन पकाया जाता। इस तरह से आग वृंदावन मंदिर तक पहुंची। तब से आज भी जल रही है।
नहीं जली माचिस
लाखों श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र में पिछले पांच सालों ने न तो दीपक जलाने के लिए और न ही रसोई पकाने के लिए माचिस से आग नहीं सुलगाई गई। संरक्षित आग का ही उपयोग किया जाता है।
करने पड़ते हैं जतन
मंदिर के सेवारत लोग बताते हैं कि श्री गोपालभट्ट गोस्वामी ने पांच सौ साल पहले रसोईघर के बड़े चूल्हे में आग जलाने की परंपरा शुरू की थी। उन्होंने बताया रसोईघर में दो चूल्हे हैं।
बड़े चूल्हे में आग को लकड़ियां डालकर जलाये रखा जाता है। आग जलना बंद न हो, इसके लिए एक छोटे चूल्हे में आग लगातार जलाई जाती है। बड़े चूल्हे पर खाना बनाने के बाद पांच सात लकड़ियां रखकर उसे तवे से ढक दिया जाता है ताकि आग भीतर ही भीतर सुलगती रहे।
परंपरा का निर्वाह
ठाकुर श्रीराधारमण की सेवा चैतन्य महाप्रभु के परम भक्त गोपालभट्ट गोस्वामी ने जीवन पर्यन्त की। बताते हैं कि श्रीचैतन्य महाप्रभु भारत भ्रमण पर थे। वे दक्षिण भारत श्रीरंगम मंदिर पहुंचे, उसी दौरान चातुर्मास शुरू हो गया। इस कारण उन्हें चार महीने तक वहीं पर रुकना पड़ा।
रंगम मंदिर के पुजारी वेंकट भट्ट ने उनकी बहुत सेवा की। ईश्वर भक्ति को देख चैतन्य महाप्रभु ने उनके बेटे गोपाल भट्ट को उन्हें देने को कहा। जिसके बाद चैतन्य महाप्रभु गोपाल भट्ट गोस्वामी को वृंदावन ले आए।