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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Nov 25, 2015 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

यहां है मेंढ़क मंदिर

ओयल शैव सम्प्रदाय का प्रमुख केन्द्र था। ओयल के शासक भगवान शिव के उपासक थे।

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Publish Date: Wed, 25 Nov 2015 05:27:27 PM (IST)Updated Date: Mon, 30 Nov 2015 11:58:51 AM (IST)
यहां है मेंढ़क मंदिर

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर-खीरी जिले से महज 12 किलोमीटर दूर स्थित है ओयल कस्बा। यहां एक ऐसा मंदिर जो इतिहास में मेंढ़क मंदिर के नाम से जाना जाता है। भगवान शिव का यह मंदिर आज भी यहां मौजूद है। जहां वर्षभर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।

यह मंदिर राजस्थानी स्थापत्य कला का अनुपम संगम है। कहते हैं यह मंदिर तांत्रिक मण्डूक तंत्र पर बना है। इसका जीता जागता उदाहरण है मंदिर की मीनारों पर उत्कीर्ण मूर्तियां जो कि इसे तांत्रिक मंदिर के रूप में प्रदर्शित करती हैं।


मान्यता है कि मंदिर में मौजूद नर्मदेश्वर महादेव का शिवलिंग भी रंग बदलता है। यह मंदिर पत्थर के मेंढ़क की पीठ पर बनाया गया था। इतिहास की किताबों में उल्लेख मिलता है कि यह मंदिर ओयल स्टेट के राजा बख्त सिंह ने करीब 200 साल पहले बनवाया था। मेंढ़क विज्ञान की भाषा में कहें तो उभयचर प्राणी है। इसका संबंध बारिश और सूखा से है। राज्य में प्राकृतिक आपदाएं न आएं इसलिए इस मंदिर का निर्माण राजा ने करवाया था।

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इतिहास के पन्नों को ओर पलटे तों मंदिर के बारे में और अधिक जानकारी मिलती है। दरअसल ओयल कस्बा प्रसिद्ध तीर्थ नैमिषारण्य क्षेत्र का एक हिस्सा हुआ करता था। नैमिषारण्य और हस्तिनापुर मार्ग में पड़ने वाला कस्बा अपनी कला, संस्कृति तथा समृद्धि के लिए विख्यात था। ओयल शैव सम्प्रदाय का प्रमुख केन्द्र था। ओयल के शासक भगवान शिव के उपासक थे।

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ओयल के इस मंदिर में एक विशालकाय मेंढक मंदिर प्राचीन तांत्रिक परम्परा का एक महत्वपूर्ण साक्ष्य हैं। मेंढक मंदिर 38 की लंबाई मीटर, 25 मीटर चौड़ाई में निर्मित है। एक मेढक की पीठ पर बना यह मंदिर मेंढक के शरीर का आगे का भाग उठा हुआ तथा पीछे का भाग दबा हुआ है जो कि वास्तविक मेंढक के बैठने की मुद्रा है। वैसे तो हमारे भारत में तंत्र से संबंधित कई मंदिर और प्रतिमाएं हैं लेकिन मांडूक तंत्र मंदिर अपना एक विशेष महत्व रखता है।

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