
सुरेन्द्र दुबे, नईदुनिया जबलपुर। संस्कारधानी की पहाड़ियों में आस्था की अपनी कई कथाएं हैं। कहीं प्राकृतिक गुफा श्रद्धा का केंद्र है तो कहीं किसी शिला में भगवान का स्वरूप दिखाई देता है। रतन नगर की पहाड़ी पर स्थित सुप्तेश्वर गणेश की कथा इन सबसे अलग है।
यहां भगवान गणेश की प्रतिमा किसी शिल्पकार ने गढ़ी नहीं, बल्कि प्राकृतिक शिला में उभरी आकृति को भक्त गजानन का स्वयंभू स्वरूप मानकर पूजते हैं। इस आस्था के पीछे एक स्वप्न की कथा है, पहाड़ी पर मिली एक विशाल शिला है और फिर तीन दशक से अधिक समय में इस स्थान से जुड़ती चली गई श्रद्धा है।
मंदिर से जुड़े विवरणों के अनुसार इसकी कहानी वर्ष 1985 से शुरू होती है। सुधा अविनाश राजे को भगवान गणेश के विराट स्वरूप के स्वप्न में दर्शन होने की बात कही जाती है। इसके बाद पहाड़ी और शिला से जुड़े संकेत मिलने की कथा भी सामने आती है।
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दरअसल, रतन नगर की पहाड़ी पर जब प्राकृतिक शिला में गणेश जैसी आकृति दिखाई दी तो इसे उसी स्वप्न से जोड़कर देखा गया। श्रद्धा ने शिला को भगवान का स्वरूप माना और यहीं से सुप्तेश्वर गणेश की पूजा का क्रम शुरू हुआ। इस आस्था यात्रा में चार सितंबर, 1989 का दिन महत्वपूर्ण माना जाता है।
उपलब्ध विवरणों के अनुसार इसी दिन प्राकृतिक शिला का गंगाजल और नर्मदा जल से अभिषेक किया गया। सिंदूर और घी अर्पित कर पूजा की शुरुआत हुई। धीरे-धीरे आसपास के लोग यहां पहुंचने लगे और पहाड़ी का यह स्थान नियमित पूजा-अर्चना का केंद्र बन गया।
जबलपुर के लिए नर्मदा केवल एक नदी नहीं, बल्कि जीवन और आस्था की धुरी है। इसलिए सुप्तेश्वर की स्थापना कथा में नर्मदा जल का जुड़ना इस स्थान को संस्कारधानी की धार्मिक चेतना से भी जोड़ देता है। सुप्तेश्वर गणेश की सबसे बड़ी विशेषता प्राकृतिक शिला ही है।
सामान्य तौर पर मंदिरों में भगवान की प्रतिमा स्थापित की जाती है, लेकिन यहां चट्टान में उभरी आकृति को ही गजानन का स्वरूप मानकर पूजा जाता है। सिंदूर से सजी विशाल शिला के सामने खड़े होकर श्रद्धालु उसके प्राकृतिक आकार में गणेश के स्वरूप का अनुभव करते हैं। आस्था की यही दृष्टि इस स्थान को विशिष्ट बनाती है।

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जबलपुर की पहचान मां नर्मदा, पहाड़ियों, मंदिरों और लोकविश्वासों से मिलकर बनी है। सुप्तेश्वर इसी पहचान की एक नई और अलग कड़ी है। यहां न कोई विशाल प्राचीन स्थापत्य कथा है और न किसी राजवंश का इतिहास। यहां कहानी है तो एक स्वप्न की, एक शिला की और उस शिला में भगवान को देखने वाली श्रद्धा की।
सुप्तेश्वर की सबसे सुंदर बात यही है कि यहां प्रतिमा पहले नहीं बनी, पहले विश्वास जन्मा। शिला पहले से थी, उसमें गजानन का स्वरूप भक्तों की आस्था ने देखा और फिर वही प्राकृतिक आकृति एक तीर्थ में बदलती चली गई।
रतन नगर की पहाड़ी पर आज जब सिंदूर से सजी उस विशाल शिला के सामने श्रद्धालु हाथ जोड़ते हैं तो उनके लिए वह केवल पत्थर नहीं रहता। वह विघ्नहर्ता का दरबार बन जाता है।
कोई अर्जी लेकर आता है, कोई मनोकामना लेकर और कोई केवल इस विश्वास के साथ कि प्रकृति की गोद में विराजे इस अनोखे गणेश के दर्शन से मन को एक नई शक्ति मिलेगी। यही विश्वास सुप्तेश्वर को संस्कारधानी की आस्था के नक्शे पर अपनी अलग पहचान देता है।