
धम्मपद अट्ठकथा में उल्लेख मिलता है कि, 'प्राचीनकाल में गौतम बुद्ध अपने किसी पूर्व जन्म में सुमेध नामक ब्राह्मण कुमार के रूप में आंध्रप्रदेश की नई राजधानी अमरावती में पैदा हुए थे।' अमरावती सम्राट अशोक की मृत्यु के बाद से तक़रीबन चार शताब्दियों तक दक्षिण भारत में सातवाहनों का शासन रहा।
इतिहास में वर्णित है कि, आंध्रवंशीय सातवाहन नरेश शातकर्णी ने लगभग 180 ई.पू. अमरावती को अपनी राजधानी बनाया था। सातवाहन नरेश ब्राह्मण होते हुए भी महायान मत के पोषक थे। और उन्हीं के शासनकाल में अमरावती का प्रसिद्ध बौद्ध स्तूप बना, जो तेरहवीं शताब्दी तक बौद्ध यात्रियों के आकर्षण का केन्द्र बना रहा।
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इसे कहते हैं धम्मपद : दरअसल धम्मपद बौद्ध साहित्य का लोकप्रिय ग्रंथ है। इसमें बुद्ध भगवान् के नैतिक उपदेशों का संग्रह यमक, अप्पमाद, चित्त आदि 26 वर्गों में वर्गीकृत 423 पालि गाथाओं में किया गया है। त्रिपिटक में इसका स्थान सुत्तपिटक के पांचवें विभाग खुद्दकनिकाय के खुद्दकपाठादि 15 उपविभागों में दूसरा है।
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ग्रंथ की आधी से अधिक गाथाएं त्रिपिटक के सुत्तों में प्रसंगबद्ध पाई जा चुकी हैं। ऐसा माना जाता है कि कुछ गाथाएं ऐसी भी प्रतीत होती हैं जो मूलत: परंपरा की नहीं थीं, लेकिन भारतीय ज्ञान के उस अपार भंडार में से ली गई है जहां से वे उपनिषद्, गीता, मनुस्मृति, महाभारत, जैनागम एवं पंचतंत्र आदि कथा कहानियों में भी नाना प्रकार से प्रविष्ट हुई हैं। धम्मपद की रचना उपलब्ध प्रमाणों से ई.पू. 300 व 100 के बीच हो चुकी थी।