- पंडित 'विशाल' दयानंद शास्त्री
इस्लाम धर्म में गायत्री मंत्र जैसा ही महत्त्व सूरह फातेह को दिया गया है। हिंदी और उर्दू में प्रकाशित पुस्तिका 'युग परिवर्तन इस्लामी दृष्टिकोण में सूरह फातेह' के तीन चरणों को गायत्री मंत्र की तरह जपने का प्रस्ताव किया गया है।
इसे विचारशील मु्स्लिम ने भी स्वीकार भी किया है। जरूरत यही है कि कर्मकाण्ड के कलेवर के साथ गायत्री विद्या के प्राण को भी जाग्रत् किया जाए।
उपासना, साधना तथा आराधना के स्वरूप को और उन्हें जीवन में गतिशील बनाने के सूत्रों को जन- जन तक पहुंचाया जाए तो उज्ज्वल भविष्य में सब की भागीदारी सुनिश्चित की जा सकती है। इस वर्ष गायत्री जयंती का पर्व 28 मई,2015 (गुरुवार) के दिन है।
गायत्री मंत्र का भाव यदि किसी भी भाषा में दुहराया जाए, तो वह भी मंत्र की तरह ही काम करता है। थियोसॉफिकल सोसाइटी की पुस्तक 'भारतीय समाज में पूजा की भूमिका में दिव्य दृष्टि' सम्पन्न पादरी लैडविटर ने उक्त तथ्य को स्पष्ट किया है।
गायत्री जयंती पर्व गायत्री महाविद्या के अवतरण का पर्व है। इसी दिन युगऋषि ने काया त्यागकर स्वयं को वायु और सूर्य की तरह व्यापक बनाने का शुभारंभ किया था।
पढ़ें : यह मंत्र है जगत की आत्मा, मानते हैं अनेक धर्म संप्रदाय
इस पर्व को लक्ष्य करके सभी नैष्ठिक गायत्री साधकों को प्रयास करना चाहिए कि गायत्री मंत्र जप आदि कर्मकाण्ड कलेवर को अपनायें, किंतु उसमें गायत्री के प्राण का, गायत्री महाविद्या का भी समावेश करें। छुट्टियों के दिनों में साधना प्रशिक्षण सत्र चालाए जाएं।
नए साधकों, नवदीक्षितों के लिए सबके लिए सुलभ उपासना- साधना पुस्तिका को माध्यम बनाया जाए। कुछ विकसित साधकों के लिए जीवन देवता की साधना- आराधना में वर्णित प्रज्ञायोग साधना को आधार बनाया जाए।
नए क्षेत्रों तथा विभिन्न वर्गों तक गायत्री मंत्र, गायत्री विद्या पहुंचाने तथा उन्हें उसमें प्रवृत्त करने के लिए संकल्प किये जायें तथा तद्नुसार स्वयं का व्यक्तित्व और कौशल विकसित किया जाये, निखारा जाए।
पढ़ें : वेदों से हुई उत्पत्ति इसलिए हैं वेदमाता
यह कार्य आसान तो नहीं है, किंतु बहुत कठिन भी नहीं है। जहां ऋषि चेतना का समर्थन है तथा साधकों का संकल्पबद्ध पुरुषार्थ है, वहां सफलता तो मिलनी ही मिलनी है। जो इसके लिए समुचित संकल्प करने तथा तप साधना अपनाने का साहस दिखायेंगे, वे अवश्य ही नए कीर्तिमान बनाएगें।