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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jun 03, 2015 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

यज्ञ की आहुतियों में है प्रदूषण खत्म करने के रत्न

लेकिन वर्तमान समय में यज्ञ होना ही किसी भव्य आयोजन से कम नहीं।

By Edited By:
Publish Date: Wed, 03 Jun 2015 03:43:00 PM (IST)Updated Date: Tue, 09 Jun 2015 04:02:34 PM (IST)
यज्ञ की आहुतियों में है प्रदूषण खत्म करने के रत्न

प्रदूषण इस पृथ्वी पर एक ऐसी समस्या बनकर उभरा है। जिसे समय पर काबू नहीं पाया गया तो यह समूचे जीव जगत को नष्ट कर देगा। प्रदूषण के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार इंसान है।

लेकिन यही इंसान प्राचीन काल में प्रदूषण नियंत्रण के लिए तमाम उपायों को आजमाया करता था। उस जमाने में प्रदूषण नियंत्रण करने के लिए यज्ञ होते थे। लेकिन वर्तमान समय में यज्ञ होना ही किसी भव्य आयोजन से कम नहीं।

अथर्ववेद में कहा गया है, 'अग्नि से धुआं उत्पन्न होता है। धुएं से बादल बनते हैं और बादलों से वर्षा होती है। वेदों में यज्ञ का अर्थ 'प्राकृतिक चक्र को संतुलित करने की प्रक्रिया' बताया गया है।' यजुर्वेद की काण्व संहिता में अग्निहोत्री यज्ञ को वर्षा का उत्पादक प्रदान करने वाला बताया गया है।


ठीक इसी तरह वायुपुराण में महर्षि वेदव्यास ने लिखा है, 'इस पृथ्वी के अपने स्वरूप में परिपक्व हो जाने पर इसका अंधा- धुंध दोहन न किया जाए, क्योंकि इंसान की महत्वाकांक्षा एक समय के बाद इतनी बढ़ जाएगी कि वह प्राकृतिक संसाधनों का बेतहाशा दोहन करेगा। ऐसे में वो अपने अंत के निकट पहुंच जाएगा और फिर प्रकृति एक बार फिर मौत का तांडव यानी प्रलय रूप में प्रकट हो होगी।'

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आज से करीब 7 वर्ष पहले जून 2009 में भारतीय वैज्ञानिकों ने उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के कुछ खेतों में वैदिक ऋचाओं के समवेत गायन किया था। इस संगीत को सुनने के बाद वहां की पैदावार में दो से तीन गुनी तक अधिक वृद्धि होते देखी थी।

वैज्ञानिकों ने स्वीकार किया है कि यज्ञ और उसमें बोले गए मंत्रों से वातावरण में ऑक्सीजन तथा कॉर्बन डाइऑक्साइड का सही संतुलन बना रहता है जिससे पौधों की जल्द वृद्धि संभव है। यानी विज्ञान वेदों के इस प्रयोग को मानता है।

यज्ञ धार्मिक पूजा-पाठ ही नहीं बल्कि प्रदूषित वातावरण को दूर करने का एक सुरक्षा कवच है। यज्ञ, मानसिक रोग, शारीरिक रोग तथा वनस्पतियों के विभिन्न रोगों को दूर कर उन्हें स्वस्थ तथा उन्नत बनाता है।

वैदिक साहित्य में भूमि प्रदूषण के निवारण के लिए अनेक उपाय हैं। उन उपायों में यज्ञ महत्वपूर्ण है, वेदों में वर्णित है कि करीर (एक पौधा) जिसे यज्ञ में आहुति देने से शीघ्र जल्द ही वर्षा होती है। यहां पलाश वृक्ष को ब्रह्मतुल्य कहा गया है, जो यज्ञ में आहुति से व्यापक प्रदूषण को दूर करता है।

यज्ञ से दूर होता है भूमि प्रदूषण

यज्ञ की भस्म में उर्वरक शक्ति होती है। आधुनिक अनुसंधानों यह बात सिद्ध कर चुके हैं। यज्ञ में गाय के दूध से बने घी का उपयोग होता है इससे रोगी भी जल्द ठीक हो जाते हैं। घर में यदि यज्ञ करते हैं तो घर के अंदर का वातावरण शुद्ध होता है। गाय के घी में अन्न शक्कर मिलाकर दी गई आहुतियां देने से यह वर्षा में सहायक होती है क्यों कि इससे फार्मेल्डीहाइड गैस बनती है, जो कीटाणुओं को नष्ट करके वायु को प्रदूषण मुक्त करने में सहायक है।

मान्यता है कि अग्निहोत्र तथा अन्य यज्ञों में ऋतु तथा यजमान की कामना के अनुसार भिन्न-भिन्न पदार्थों से बने हवन सामग्री से आहुतियां दी जाती है। इनमें वाष्पशील तत्व 200 से 400 अंश सेल्सियस के तापमान पर ऊपर उठ जाते है तथा वायु से मिलकर दूर-दूर तक पहुंच जाते हैं।

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यज्ञ में उच्चारित मंत्रों से उत्पन्न स्पंदनों का विशेष महत्व होता है। कई वर्ष पहले फ्रांस के वैज्ञानिक डॉ. टिलबर्ट ने चेचक, क्षय तथा हैजे आदि रोगों के उपचार के लिए यज्ञ चिकित्सा का उपयोग किया जिसके सकारात्मक प्राप्त हुए। ये मंत्र वेदों से लिए गए थे।

यदि आप सुबह के समय बीस मिनट तक थोड़ी-सी सामग्री वाली धूप (धृप) से कुछ वैदिक मंत्रों का जाप कर यज्ञ करें तो लगभग 24 घंटे तक एक कवच मिल सकता है। विज्ञान के मूलस्त्रोत अथर्ववेद में कहा गया है कि यज्ञ करने वाले को यज्ञ की पावन अग्नि मृत्यु की से भी बचा लाने की शक्ति है।