वैदिक ज्योतिष में चन्द्र और शनि का योग विष योग के नाम से प्रसिद्ध है। इसका कारण ज्योतिष में शनि को जहर का कारक माना जाना है। चन्द्र पानी का कारक होता है और जब उसमे शनि का जहर मिल जाता है तो वो जहरीला हो जाता है।

चंद्र दूध का भी कारक होता है और जब दूध में जहर मिलता है तो सफेद से नीला हो जाता है और नीला रंग राहु का माना गया है और शनि का भी अर्थात इन दोनों ग्रहों का पूर्ण प्रभाव जातक पर पड़ता है।

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पं. दयानंद शास्त्री बताते हैं कि चंद्र हमारे मन और मानसिक सुख का कारक है तो शनि उदासी और वैराग्य के कारक होते है। जब चंद्र को शनि का साथ मिलता है तो उस जातक में चंद्र की चंचलता समाप्त हो जाती है। इस पर शनि की उदासी हावी हो जाती है।

जातक मानसीक रूप से अशांत रहने लग जाता है और उसमे एक वै राग्य की भावना का जन्म होने लग जाता है। सभी जानते हैं की चंद्रमा हमारी माता का भी कारक होता है और शनि का प्रभाव जातक की माता को भी स्वास्थ्य से सम्बंधित समस्या प्रदान करता है।

यदि आपने ध्यान दिया होगा तो अमावस्या की काली रात जो की शनि की होती है उसमे चन्द्र नही निकलता है । शनि के अंधेरे में चंद्र गुम हो जाता है। यानी जब शनि का पूर्ण अशुभ प्रभाव चन्द्र पर हो तो जातक को चन्द्र से संबंधित समस्या का सामना करना पड़ जाता है।

लाल किताब में भी चंद्र को धन और शनि को खजांची कहा गया है और जब इन दोनों का साथ हो तो जातक के धन की रखवाली जहरीला सांप करता है। यानी जातक के पास धन हो तो भी वो उसका प्रयोग नही कर सकता यानी धन की थैली पर सांप कुण्डली मार कर बैठ जाता है।

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किसी भी ज्योतिषी को चंद्र शनि का साथ देखते ही विष योग नही कह देना चाहिए। सबसे पहले तो ज्योतिषी को इनके अंश देखने चाहिए। यदि इनके अंशो में 12 अंश का अंतर है तो इनका योग प्रभावी नही होगा और अपना पूर्ण दुष्प्रभाव नही दे पाएगा।

इसके बाद ये देखें की किस लग्न की कुंडली में यह योग, किस भाव में बन रहा है। जैसे मेष लग्न की कुंडली में यदि ये दोनों लग्न में ही हो तो ये योग प्रभावी होगा क्योंकि शनि मेष राशि में नीच के होते है लेकिन यही योग यदि दशम भाव में हो तो ये योग प्रभावी नही होगा क्योंकि शनि अपनी ही राशि में होगा और चन्द्र अपने भाव को देख रहा होगा।

इसी तरह यदि ये योग चाहे कोई भी लग्न हो 6, 8 या 12वें भाव में पूर्ण रूप से लागू होगा। ऐसे में चन्द्र अपना कारक वस्तुओं के अलावा कुंडली के जिस भाव के मालिक होंगे उसके सुख में भी कमी के योग बनेगे। जैसे मेष लग्न में चोथे भाव यानी वाहन, भूमि, माता, ग्रहस्थ सुख आदि के सुख में शनि कमी करेगा। ठीक इसी प्रकार आप अन्य लग्न को देखकर इसके फल का अंदाज़ा लगा सकते हो।

विष योग से डरने की जरूरत नही है ज्योतिष में यदि कोई कुयोग है तो उसका निवारण या उपाय भी है। आप जानते है की शिव जी ने जब विष को पीया था और संसार को बचाया था। यदि आप भगवान शिव की शरण में जाते है तो वे आपके ऊपर इस योग का दुष्प्रभाव नही पड़ने देंगे।

उपाय स्वरूप आप किसी भी शिव मंदिर में शिवलिंग को नित्य जल अर्पित करें। यदि संभव हो सके तो गन्ने का रस शिवलिंग पर चढ़ाये । यदि ये भी सम्भव न हो तो शिवलिंग पर बर्फ चढ़ानी चाहिए।

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