कैसे और क्यों रचा गया 'पांचवा वेद'
भारतीय नाट्यशास्त्र में नृत्य मुद्राओं में पशु-पक्षियों को आकृति को दर्शाया जाता है।
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Publish Date: Mon, 22 Feb 2016 04:00:00 PM (IST)
Updated Date: Wed, 24 Feb 2016 09:40:56 AM (IST)

'नाट्यशास्त्र' भारतीय शास्त्रीय नृत्य का आदिग्रन्थ है। भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र की रचना की है। भरत नाट्य शास्त्र के बारे में किंवदंति है, त्रेता युग में जब लोग दु:ख, मोह और भी तमाम भावनात्मक विकारों से पीड़ित हो रहे थे।
तब इन्द्र की प्रार्थना पर ब्रह्मा ने चारों वर्णों के मनोरंजन और अलौकिक आनंद के लिए 'नाट्यवेद' यानी पांचवें वेद का निर्माण किया। वेद चार होते हैं। जो कि क्रमशः ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद हैं।
इस वेद का निर्माण ऋग्वेद से पाठ्य वस्तु, सामवेद से गान, यजुर्वेद में से अभिनय और अथर्ववेद में से रस लेकर किया गया था। भरतमुनि को उसका प्रयोग करने का कार्य सौंपा गया। भरतमुनि ने 'नाट्य शास्त्र' की रचना की और अपने पुत्रों को पढ़ाया और यह सिलसिला सदियों से चलता आ रहा है।
नाट्य शास्त्र की भावभंगिमाएं
भारतीय नाट्यशास्त्र में नृत्य मुद्राओं में पशु-पक्षियों को आकृति को दर्शाया जाता है। भारतीय नाट्य शास्त्र में मोर से संबंधित कई नृत्य मुद्राएं मिलती हैं। लेकिन यूरोप में मोर पंख शैतानी ताकत के रूप में देखा जाता है। मोर हमारे यहां सौंदर्य का प्रतीक है।
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ठीक इसी तरह सर्प से हैं पश्चिम में कुछ जगहों पर वो शैतान का प्रतीक हैं तो हमारे यहां पूज्य हैं। भारतीय नाट्य शास्त्र में सर्प की भावभंगिमाओं को भी नृत्य में शामिल किया गया है। भारत में पशु-पक्षियों से बहुत पहले से तारतम्यता बनाए रखने की सीख ली थी।
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इसका उदाहरण हैं विष्णु शर्मा द्वारा लिखित पंचतंत्र और हमारा एक और ग्रंथ हितोपदेश, जब कि पश्चिम में यह संभव न हो सका। लेकिन कुछ पशु जैसे बिल्लियां पश्चिम में प्रिय पशु है तो हमारे यहां नकारात्मक रूप में देखीं जाती हैं।