हिंदू धर्म में सदियों पुरानी है 'तिलक की महिमा'। यह परंपरा यूं ही नहीं बनीं इसके पीछे हमारे पूर्वजों का वैज्ञानिक दृष्टिकोण था। हमारे पौराणिक ग्रंथों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि मस्तिष्क के मध्य में भगवान श्री हरि का निवास है। इसलिए मस्तिष्क के मध्य में तिलक लगाया जाता है।

तिलक लगाना सात्विकता का प्रतीक है। कोई भी शुभकार्य करने से पहले तिलक लगाने की परंपरा सदियों से विद्यमान है। तिलक अमूमन हल्दी, कुमकुम, चंदन और रोली से लगाया जाता है। तिलक लगाने के बाद अक्षत यानी चावल लगाने की भी परंपरा है।

तिलक लगाने के बाद चावल लगाने का भी प्रचलन है, अक्षत यानी चावल शांति का प्रतीक है। इसलिए तिलक लगाने के बाद चावल लगाया जाता है। मस्तिष्क के जिस स्थान पर तिलक लगाया जाता है, उसे आज्ञाचक्र कहा जाता है। शरीर शास्त्र के अनुसार यहां पीनियल ग्रंथि होती है। तिलक पीनियल ग्रंथी को उत्तेजित बनाए रखती है। ऐसा होने पर मस्तिष्क के अंदर दिव्य प्रकाश की अनुभूति होती है।

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इसलिए पूजा, पाठ के दौरान मस्तिष्क के मध्य में तिलक लगाने का रिवाज है। स्त्रियां अमूमन अपने मस्तिष्क के मध्य में कुमकुम लगातीं हैं। यह लाल रंग का होता है। लाल रंग ऊर्जा का प्रतीक होता है। तंत्र शास्त्र में मस्तिष्क पर तिलक देव रूप का प्रतीक माना गया है। ऐसा करने पर मानसिक शांति मिलती है। ध्यान के दौरान मस्तिष्क पर तिलक लगा हो तो एकाग्रचित्त जल्द हो जाते हैं।

सनातन धर्म में शैव, शाक्त, वैष्णव और अन्य मतों के अलग-अलग तिलक लगाए जाते हैं जैसे कि...

  • शैव: ललाट पर चंदन की आड़ी रेखा या त्रिपुंड लगाया जाता है।
  • वैष्णव: इस परंपरा में चौंसठ प्रकार के तिलक बताए गए हैं। इनमें प्रमुख लालश्री तिलक (इसमें आसपास चंदन की व बीच में कुंकुम या हल्दी की खड़ी रेखा बनी होती है।)
  • शाक्त: शाक्त सिंदूर का तिलक लगाते हैं।
  • विष्णुस्वामी तिलक: यह तिलक माथे पर दो चौड़ी खड़ी रेखाओं से बनता है। यह तिलक संकरा होते हुए भोहों के बीच तक आता है।
  • रामानंद तिलक: विष्णु स्वामी तिलक के बीच में कुंकुम से खड़ी रेखा देने से रामा नंदी तिलक बनता है।
  • श्यामश्री तिलक: इसे कृष्ण उपासक वैष्णव लगाते हैं। इसमें आसपास गोपीचंदन की तथा बीच में काले रंग की मोटी खड़ी रेखा होती है।

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  • अन्य तिलक: तांत्रिक, कापालिक आदि के भिन्न तिलक होते हैं। कई साधु व संन्यासी भस्म का तिलक लगाते हैं।

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