
त्रैतायुग में जब रावण ने सीता का अपहरण कर लिया तब श्रीराम की सेना रावण पर चढ़ाई कर रही थी। ऐसे समय में लंकापति के छोटे भाई विभीषण किसी भी तरह रावण के विचारों में परिवर्तन लाकर उसे बचाना चाहते थे।
विभीषण रावण के पास पहुंचे। रावण की लंका में उसका स्वर्ण भवन मूल्यवान रत्नों से सुसज्जित था। वहां वेदों का पाठ हो रहा था। वाद्यवृंन्दों के साथ गायक प्रभाती गा रहे थे। ऐसे वातावरण में विभीषण रावण के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए।
उन्होंने रावण से कहा, 'जब से आप श्रीराम की पत्नी सीता को यहां लाए हैं। जब से लंका में अपशकुन हो रहे हैं। आप सीता को उनके घर सुरक्षित पहुंचा दीजिए ऐसा करने पर लंका बच सकती है।'
रावण ने कहा, 'यह कभी नहीं हो सकता। तुम जा सकते हो। लेकिन विभीषण की यह बातें सुनकर रावण के मन अशांत हो गया। दूसरे दिन उसने मंत्रीपरिषद को बुलाया।
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वह अपनी कामवासना और क्रोध को काबू में नहीं कर पा रहा था। इस बात का उल्लेख रावण ने स्वयं किया है। इसलिए वह अपने मंत्रियों से बार-बार सलाह लेता गया, उससे उसे कुछ शांति का अनुभव मिला।'
दूसरे दिन जब रावण राजसभा में पहुंचा तो उसने विभीषण और अपने सभी मंत्रियों से कहा, 'आप सभी जानते हैं कि मैं सीता को नहीं लौटा सकता। न ही सीता के प्रति अपनी भावनाएं बदल सकता हूं।
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सीता ने मुझसे एक साल की अवधि मांगी है। में इंतजार कर रहा हूं। में इस बारे में हार मानने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं हूं।'