
जगदगुरु शंकराचार्य जन्म से ही अनोखे थे। वे बचपन में ब्रह्मचर्य व्रत से सीधे सन्यास धर्म में आना चाहते थे। लेकिन वो अपनी माता का बहुत सम्मान करते थे। इसलिए सन्यास लेने से पहले माता की आज्ञा लेना उन्होंने जरूरी समझा।
लेकिन शंकराचार्य की माता ने उन्हें आज्ञा नहीं दी। शंकराचार्य दुविधा में पड़ गए समस्या यह थी कि वह बिना आज्ञा के सन्यास नहीं ले सकते थे। तब उन्होंने अपने योग बल से एक जटिल स्थित का सृजन किया।
हुआ यूं कि एक दिन नदी में स्नान करते समय एक जीव ने शंकराचार्य का पैर पकड़ लिया और गहरे जल में खींचने लगा। शंकराचार्य ने तट पर खड़ी अपनी मां को पुकारा, मां व्याकुल हो उठीं। वह अपने पुत्र के तपोबल को जानती थीं।
उन्होंने कहा कि, 'बेटा तुम इससे मुक्त हो सकते हो।' तब शंकराचार्य ने कहा, 'मां यह मेरी नियति है। नियति का निवारण मैं कैसे कर सकता हूं। मेरा जन्म जगत के उद्धार के लिए हुआ है। मैं वह नहीं कर पा रहा हूं। इसलिए मेरी नियति मुझे नीचे की ओर खींच रही है।'
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यह जानते हुए शंकराचार्य की मां ने कहा, 'बेटा तुम जगत का उद्धार करो, तुम्हारे साथ में भी तर जाउंगी। इस तरह शंकराचार्य को सन्यास लेने की अनुमति मिल गई।'
संक्षेप में
जब तक मनुष्य सांसारिक बंधनों में बंधा रहता है। तब तक वह अपने सदकर्मों के प्रति निष्ठावान होता है। भगवान शंकराचार्य द्वारा उठाया गया यह कदम इस बात का अनुकरणीय उदाहरण है।