डॉ. निखिलेश शास्त्री। धर्म ग्रंथों में प्रत्येक गृहस्थ को नित्य नैमित्तिक और काम्य इन तीन कर्म के निर्देश हैं। इनमें नित्य कर्म में स्नान, संध्या की उपासना, यज्ञ-हवन, भोजन के पश्चात वेदाध्ययन किया जाता है। इन सभी में संध्योपासना को वैदिक ऋषियों ने सर्वश्रेष्ठ माना है। ऋषियों की आस्था है कि इस उपासना से अज्ञानता में हर दिए किए गए पाप स्वत: ही नष्ट हो जाते हैं। इसी संदर्भ में महर्षि अत्रि की मान्यता है कि जो लोग प्रतिदिन संध्या करते हैं वे पापरहित होकर सनातन ब्रह्मलोग को प्राप्त करते हैं।
इसके विपरीत जो यह संध्या नहीं करते हैं, वे श्वान योनि में जन्मते हैं। कहने का मतलब यह है कि प्रत्येक गृहस्थ को संध्योपासना करनी चाहिए। जप अति फलदायी बतलाया है। आश्वलायन ग्रह्य सूत्र में बतलाया गया है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य - इन तीनों वर्णों के गृहस्थों को यज्ञोपवीत संस्कार होने के बाद ही संध्या और गायत्री जप करने का अधिकार होता है।
पुराणों में नित्य संध्या करने की विधि विस्तार से बतलाई है। सर्वप्रथम स्नान कर शुद्ध वस्त्र पहनें और तिलक लगाएं। आत्मशुद्धि के लिए तीन आचमन करें। साथ ही 'ऊं अपवित्रो पवित्रो वा" इस मंत्र से बाहरी वातावरण शुद्ध करने के बाद पूरक, कुम्भक-रेचक सहित प्राणायाम करें। प्राणायाम से अनेक रोगों से मुक्ति हो जाती है। इसके बाद सूर्य के बारह नमस्कार करने का विधान है।
सूर्य नमस्कार में बारह योगासन हैं, जिन्हें नित्य करने से शरीर स्वस्थ और पुष्ट रहता है। तत्पश्चात तांबे के पात्र में जल लेकर सूर्य देवता को जल का अर्घ्य दिया जाता है। यहां यह मान्यता है कि सूर्य की पराबैंगनी किरणें शरीर के लिए लाभदायक होती है।
गायत्री मंत्र
सूर्यास्त के पश्चात आसन पर बैठकर गायत्री मंत्र का जाप अवश्य करें। वेदों में गायत्री मंत्र की बहुत महिमा बताई है। छांदोग्य उपनिषद् में उल्लेख है कि गायत्री मंत्र के नित्य जाप से स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है। गायत्री जप दीर्घायु, प्राणशक्ति, यशकीर्ति, धन प्राप्ति, आत्मबल की प्राप्ति, भूत-बाधा से शांति और पहले किए पापों का नाश करने वाला बतलाया है। साथ ही गायत्री मोक्षदायी मंत्र भी माना जाता है।
वस्तुत: यह चमत्कारी गायत्री मंत्र सूर्य नारायण की स्तुति है।
इस मंत्र का भावार्थ यही है कि 'ऊं - वह ब्रहस्वरूप, भू: - प्राणस्वरूप, भुव: - दुखनाशक-सुखदायी (सद्-चित्त-आनंद स्वरूप) सविता देवता, वरेण्यमं - वरण योग्य, उपासना योग्य है, भर्गो देवस्य धीमहि - ऐसे तेजस्वी सूर्य देवता के तेज को हम अपने अंत: करण में धारण करते हैं और उस दैदीप्यमान, सूर्यनारायण का हम ध्यान करते हैं, धियो योन: प्रचोदयात् - ऐसे वह तेजस्वी सूर्य देवता हमारी बुद्धि को सत्कर्म करने के लिए सदा प्रेरित करते रहें। अर्थात हमारी बुद्धि-मन शुभ संकल्पमय हो।" पुराणों में यह उल्लेख है कि ब्रह्माजी महर्षि वशिष्ठ और राजर्षि विश्वमित्र ने गायत्री देवी को श्राप दिया कि तुम्हाार जप निष्फल होगा, इसलिए ऋषियों ने गायत्री को श्रापमुक्त करने का निर्देश दिया है।
श्राप से मुक्त करने का मंत्र है 'गायत्री देवी! त्वं ब्रह्मशापात् विमुक्ता भव, त्वं वशिष्ठ शापात् विमुक्ता भव, त्वं विश्वमित्रा शापात् विमुक्ता भव" तथा अंत में गायत्री देवी 'त्वं भुक्ति मुक्ति प्रदायिनी भव।" श्राप से मुक्त करने पर ही गायत्री के मंत्र का जप फलदायी होता है। जब करते समय गायत्री मंत्र का अर्थानुसंधान करते हुए सूर्य देवता का ध्यान करते रहना चाहिए। जब यथाशक्ति यह गायत्री जप हो जाए तब अंत में यह सारा जप सूर्य देवता को उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए इस मंत्र को समर्पित कर दें। 'अनेन प्रात: संध्योपासना न रुयेण कर्मणा श्री सूर्यनारायण देवता प्रीयतां न मम।" क्योंकि पुराणों में उल्लेख है कि यदि जप सूर्य देवता को समर्पित न किया तो इंद्र इस जप से प्राप्त समस्त पुण्य का हरण कर लेता है।
अत: दाएं हाथ में जल लेकर आसन के नीचे छोड़ दें। तब गायत्री मंत्र का जाप फलदायी हो जाता है।
तत्वदर्शियों ने गायत्री मंत्र के जप करने के कुछ नियम निर्धारित किए हैं। इनमें संध्योपासना और गायत्री जप का समय सूर्योदय से पहले हैं, इस समय की गई संध्या मनोकामना पूर्ण करने वाली है (स्वकाले सेविता नित्यं संध्या काम दुधा भवेत्)। दूसरे बैठने का आसन बदलना नहीं चाहिए और जप को संध्या नित्य एक जैसी होनी चाहिए। माला के सुमेरू को लांघने का भी निषेध है अत: माला को अंगूठे से स्पर्श करते हुए मध्यमा अंगुली से आगे बढ़ाना जिससे तर्जनी का स्पर्श न हो।
जप करते समय न तो बोलना चाहिए और न ही शरीर में किसी तरह की हलचल या कंपन होना चाहिए। साथ ही माला को गोमुखी से या शुद्ध कपड़े से ढंककर मंत्र का मन ही मन जाप करना चाहिए। वैसे तो गायत्री एक वैदिक छंद का नाम है, तथापि उपासकों ने इस गायत्री को एक मूर्त रूप दे दिया है। मूर्ति में गायत्री को देवी के रूप में लाल वस्त्र पहनें, हंस पर विराजमान बतलाया है। इस प्रकार नित्य संध्योपासना धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदायिनी है। इस उपासना में धर्म है साथ ही अर्थ अर्थात धन की प्राप्ति भी है, काम यानि मनोकामनाओं की पूर्ति है और यह मोक्षदायी है इसलिए धर्म ग्रंथों में निर्देश है कि प्रत्येक गृहस्थ को सुख-समृद्धि की प्राप्ति के लिए नित्य संध्योपासना करनी चाहिए।