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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 05, 2015 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

कभी यहां दी जाती थी काम शिक्षा लेकिन अब बचे हैं अवशेष

जुराहो को अलबरूनी ने 'जेजाहुति' कहा है, जबकि संस्कृत में खजुराहो को 'जेजाक भुक्ति' बोला जाता है।

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Publish Date: Wed, 05 Aug 2015 04:33:53 PM (IST)Updated Date: Sat, 08 Aug 2015 02:31:53 PM (IST)
कभी यहां दी जाती थी काम शिक्षा लेकिन अब बचे हैं अवशेष

मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित है 'खजुराहो'। खजुराहो को अलबरूनी ने 'जेजाहुति' कहा है, जबकि संस्कृत में खजुराहो को 'जेजाक भुक्ति' बोला जाता है। खजुराहो की विशेषता यहां की मूर्तिकला है। जिसमें अति संवेदनशील आकृतियां पत्थरों पर उत्कीर्ण हैं।

खजुराहो के मंदिर और महर्षि वात्स्यायन के रचित ग्रंथ कामसूत्र में बस अंतर इतना है कि खजुराहो में काम चित्र पत्थरों पर उत्कीर्ण हैं, और ग्रंथ में पन्नों पर। खजुराहो की कला की मूल भावना कामसूत्र से ही ली गई है। यह मंदिर इसलिए विश्वप्रसिद्ध हैं।


खजुराहो के मंदिर के बाहर कामकला के आसनों में दर्शाए गए चेहरों पर एक अलग ही आभा झलकती है। ये मंदिर मूर्तिशिल्प भारतीय स्थापत्य और कला की अमूल्य धरोहर हैं। इन मंदिरों की इस भव्यता, सुंदरता और प्राचीनता को देखते हुए ही इन्हें विश्व धरोहर में शामिल किया गया है।

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कहते हैं प्राचीन काल में यहां के 22 मंदिरों में एक कंदारिया महादेव का मंदिर काम शिक्षा के लिए मशहूर है। यह खजुराहो का सबसे विशाल तथा विकसित शैली का मंदिर है। 117 फुट ऊंचा, लगभग इतना ही लंबा तथा 66 फुट चौड़ा यह मंदिर सप्तरथ शैली में बनाया गया था।

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यह मंदिर भगवान भोलेनाथ को समर्पित है। इस मंदिर का निर्माण राजा विद्याधर ने मोहम्मद गजनवी को दूसरी बार परास्त करने के बाद 1065 ई. के लगभग कराया था।