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जमशेदपुर के पहाड़ों में बसा चमत्कारी मंदिर जहां भक्त चढ़ाते हैं मिट्टी के हाथी, घर नहीं ले जा सकते यहां का प्रसाद

झारखंड में जमशेदपुर के निकट दलमा की पहाड़ियों में बसा 'हाथी खेदा ठाकुर मंदिर' अपनी अनूठी परंपराओं और सख्त नियमों के कारण देशभर में चर्चा में रहता है। ...और पढ़ें

By Digital DeskEdited By: Akriti kumari
Publish Date: Thu, 24 Sep 2026 02:12:37 PM (IST)Updated Date: Thu, 24 Sep 2026 02:12:37 PM (IST)
जमशेदपुर के पहाड़ों में बसा चमत्कारी मंदिर जहां भक्त चढ़ाते हैं मिट्टी के हाथी, घर नहीं ले जा सकते यहां का प्रसाद
दलमा की पहाड़ियों में स्थित 300 साल पुराना हाथी खेदा ठाकुर मंदिर। (फाइल फोटो)

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। झारखंड की दलमा पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच स्थित हाथी खेदा ठाकुर मंदिर अपनी सदियों पुरानी और अद्भुत मान्यताओं के लिए देश भर में जाना जाता है। जमशेदपुर के समीप स्थित यह मंदिर अन्य पारंपरिक मंदिरों से बिल्कुल अलग है। यहां न तो किसी देवी-देवता की संगमरमर या धातु की मूर्ति है और न ही कोई तस्वीर; बल्कि यहां मिट्टी से बने हाथियों की पूजा की जाती है।

300 साल से चली आ रही यह परंपरा न केवल लोगों की गहरी आस्था का प्रतीक है, बल्कि इंसान और जंगल के जानवरों के बीच के अनोखे रिश्ते को भी दर्शाती है।

300 साल पुरानी लोककथा: क्यों पड़ा 'हाथी खेदा' नाम?

सैकड़ों साल पहले दलमा के जंगलों से जंगली हाथियों के झुंड गांवों में आकर फसलों को तबाह कर देते थे। ढोल और मशालों के बावजूद हाथियों का आतंक कम नहीं हो रहा था। गांव के बुजुर्गों की सलाह पर ग्रामीणों ने मिट्टी के हाथी बनाकर उनकी पूजा शुरू की। इसके बाद हाथियों का हमला धीरे-धीरे बंद हो गया। स्थानीय भाषा में 'खेदा' का अर्थ होता है भगाना या दूर रखना। हाथियों के प्रकोप से रक्षा होने के कारण इस स्थान का नाम 'हाथी खेदा ठाकुर मंदिर' पड़ा।


न मूर्ति, न तस्वीर: चढ़ावे में दिए जाते हैं मिट्टी के हाथी

मंदिर परिसर में अलग-अलग आकार के अनगिनत मिट्टी के हाथी रखे हुए हैं। श्रद्धालु जब यहां कोई मनोकामना लेकर आते हैं या मन्नत पूरी होती है, तो वे प्रसाद के साथ मिट्टी का हाथी ही बप्पा/ठाकुर जी को अर्पित करते हैं। इसके साथ ही नारियल, धूप, दीप और चुनरी चढ़ाने का रिवाज है।

स्थानीय आदिवासी और ग्रामीण रिवाजों के अनुसार कई श्रद्धालु मन्नत पूरी होने पर बकरे या भेड़ की बलि भी चढ़ाते हैं।

प्रसाद को लेकर अत्यंत सख्त और अनोखे नियम

इस मंदिर में प्रसाद को लेकर दो मुख्य और कठोर नियम सदियों से लागू हैं-

  • महिलाओं के लिए मनाही: परंपरा के अनुसार यहां चढ़ाया गया प्रसाद महिलाओं को नहीं दिया जाता है।
  • घर ले जाने पर रोक: मंदिर परिसर में मिला प्रसाद वहीं ग्रहण करना अनिवार्य है। इसे किसी भी परिस्थिति में घर ले जाने की अनुमति नहीं होती।

उमड़ती है श्रद्धालुओं की भारी भीड़?

दलमा के जंगलों में आज भी जंगली हाथी विचरण करते हैं। मकर संक्रांति, चैत्र मास, स्थानीय आदिवासी त्योहारों तथा प्रत्येक मंगलवार और रविवार को यहां श्रद्धालुओं और पर्यटकों का भारी मेला लगता है।

(नोट: यह रिपोर्ट स्थानीय लोक मान्यताओं, सामाजिक-धार्मिक परंपराओं और मीडिया रिपोर्ट्स में दर्ज जानकारियों पर आधारित है।)