
मेहंदी जिसे हिना भी कहते हैं, हिंदू धर्म के सोलह श्रंगार में से एक है। दरअसल मेंहदी एक पौधा है जिसकी पत्तियों को बारीक पीसकर एक लेप बनाया जाता है।
इस लेप को हाथों, पैरों, नाखूनों बाजुओं आदि पर लगाया जाता है। कुछ घंटे लगने पर ये रच कर लाल-मैरून रंग देता है, जो लगभग सप्ताह भर चलता है।
मेहंदी का वानस्पतिक नाम 'लॉसोनिया इनर्मिस' है और यह लिथेसिई कुल का कांटेदार पौधा है। यह उत्तरी अफ्रीका, अरब देश, भारत तथा पूर्वी द्वीप समूह में पाया जाता है। हिना एक पुष्पीय पौधा होता है।
पुराणों में मेंहदी
हिंदू पौराणिक कथाओ के अनुसार, 'जब मां दुर्गा, देवी काली के रूप में राक्षसों का संहार कर रही थी, तो क्रोध में देवी को इस बात का अहसास ही नहीं हुआ कि उनका कपाल दैत्यों के रक्त से पूरी तरह रक्त से भर गया है और सारे राक्षसों का संहार हो चुका है लेकिन उनका रूप काफी भयावह था।
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देवी के इस रूप को देखकर ऋषि-मुनि और अन्य देवता परेशान हो गए। सभी देवराज इंद्र के पास पहुंचे, देवराज इंद्र उन ऋषि-मुनियों को बताया कि मां काली के गुस्से को शांत केवल भगवान शिव ही कर सकते हैं।
सभी भगवान शिव के पास पहुंचे। उनकी बात सुनकर भगवान शंकर ने देवी को बताया कि मां के आपके इस काली रूप सभी को भयभीत कर रहा है।
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ये बात जानकर मां महाकाली देवी ने अपनी इच्छा शक्ति से एक देवी को प्रकट किया, जो सुरसुंदरी कहलाईं और वह मां काली के आदेश पर औषधि बनकर हाथ-पैरों में सज गई। तभी से मेहंदी को औषधि माना जाता है, वहीं ये मेहंदी का पौधा पूजा और साधना का एक आवश्यक अंग बन गया।
आयुर्वेद में मेहंदी
मेहंदी श्रृंगार के साथ ही अपना आयुर्वेद महत्व भी रखती है। मेहंदी के पत्तों में ऐसे तत्व पाये जाते हैं, जिनसे खाघ पदार्थों को दूषित करने वाले कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। मेहंदी की छाल का प्रयोग पीलिया, बढे़ हुए जिगर और तिल्ली, पथरी, जलन, कुष्ठ और चर्म रोगों में किया जाता है।
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मेहंदी के चूर्ण में जरा सा नींबू का रस मिला कर हाथों एवं पैरों के नाखूनों पर इसका लेप करने से नाखूनों का खुरदरापन समाप्त हो जाता है और उनमें चमक आती है।