
दुनिया के हर धर्म ग्रंथ में प्रलय का उल्लेख मिलता है। यह प्रलय धरती पर भूकंप, तूफान, समुद्री तूफान और भी कई तरह से आता है। ये प्रलय क्या है? क्यों आता है? इन सारे सवालों के जबाव हमें वेदों में मिलते हैं।
हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार प्रलय का अर्थ है, 'संसार का अपने मूल यानी प्रकृति में मिल जाना। पौराणिक ग्रंथों में यह संपूर्ण ब्रह्मांड ही प्रकृति कही गई है और इसे ही शक्ति कहते हैं।' हिन्दू शास्त्रों में चार प्रकार के प्रलय बताए गए हैं जोकि क्रमश: नित्य, नैमित्तिक, आत्यन्तिक और प्राकृत प्रलय हैं।
नित्य प्रलय: वेदों के अनुसार जीवों की रोज होने वाली मृत्यु को नित्य प्रलय कहते हैं। इस तरह पृथ्वी पर जन्म-मरण का चक्र चलता रहता है।
आत्यन्तिक प्रलय: योगी या संत जब ज्ञान के द्वारा ब्रह्मलीन हो जाते हैं तब यह आत्यन्तिक प्रलय कहलती है।
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नैमित्तिक प्रलय: प्रत्येक कल्प के अंत में होने वाला तीनों लोकों का पूर्ण विनाश नैमित्तिक प्रलय कहलाता है। पुराणों अनुसार जब ब्रह्मा का एक दिन समाप्त होता है, तब विश्व का नाश हो जाता है। एक कल्प को ब्रह्मा का एक दिन माना जाता है। इसी प्रलय में धरती या अन्य ग्रहों से जीवन नष्ट हो जाता है।
प्राकृत प्रलय : ब्राह्मांड के सभी भूखण्डका मिट जाना प्राकृत प्रलय कहलाता है। वेदों के अनुसार प्राकृत प्रलय अर्थात प्रलय का वह उग्र रूप जिसमें तीनों लोकों सहित महतत्त्व अर्थात प्रकृति के पहले और मूल विकार तक का विनाश हो जाता है।
भूकंप के बारे में भारतीय मत
एक किंवदंती के अनुसार, 'पृथ्वी आठ हाथियों के सिरों पर रखी हुई है। जब कोई हाथी सिर हिलाता है तो भूकंप के झटके महसूस होते हैं।' बिल्कुल इसी तरह धरती कछुए की पीठ पर खड़े चार हाथियों पर टिकी है और वह कछुआ एक सांप के फन पर है। इनके हिलने पर भूकंप आता है।'
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भूकंप के बारे में विदेशी मत
विदेशों में भी भूकंप को लेकर कई भ्रांतियां हैं जापान के लोग मानते हैं कि धरती के भीतर मांजू नाम की एक विशाल कैटफिश है और इसी की वजह से भूकंप के झटके आते हैं। ग्रीक की पौराणिक कथाओं में माना जाता है कि धरती पर जब कुछ बुरा घटता है तो देवता दंड के तौर पर बिजली पैदा करते हैं और इससे धरती कांपने लगती है।
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अरस्तू ने भूकंप के संबंध में कहा था, 'जमीन के अंदर की गुफाओं में हवाओं के बहने की वजह से ही भूकंप आता है। जबकि ओविड नाम के रोमन कवि ने कहा था कि धरती के सूर्य के करीब आने से भूकंप आता है। क्योंकि सूर्य की विस्मयी विकिरणों से धरती कांपने लगती है।'