
धर्म डेस्क। भारत में आपको अलग-अलग पर्व और त्योहारों में अलग- अलग नियम देखने को मिलते रहते हैं। ऐसा ही कुछ आपको प्रयागराज की धरती पर आयोजित होने वाले माघ मेले के दौरान भी देखने को मिलेगा। कड़ाके की सर्दी के बीच यहां हजारों श्रृद्धालु कठोर नियमों का पालन करते हैं, जिनमें से एक है कल्पवास, इसमें छोटे-छोटे तंबुओं में रहकर जीवन के कठोर नियमों का पालन करना होता है।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश के प्रयागराज की पावन भूमि पर लगने वाला माघ मेला हर वर्ष आस्था, तपस्या और संयम का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है। ठंड के मौसम में संगम तट पर हजारों श्रद्धालु अस्थायी तंबुओं में रहकर एक महीने तक कठोर नियमों का पालन करते हैं। इस विशेष साधना को ही कल्पवास कहा जाता है। पौष पूर्णिमा से आरंभ होकर माघ पूर्णिमा तक चलने वाला यह व्रत हिंदू धर्म में अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि लोग अपने घर-परिवार को छोड़कर एक महीने तक यहां क्यों निवास करते हैं।
कल्पवास का अर्थ क्या है
कल्पवास शब्द दो भावों से मिलकर बना है। ‘कल्प’ का अर्थ समय का एक निश्चित कालखंड है, जबकि ‘वास’ का मतलब निवास करना होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, संगम तट पर एक महीने तक नियमपूर्वक रहकर साधना करने से व्यक्ति के मन और आत्मा का शुद्धिकरण होता है। ऐसा कहा जाता है कि कल्पवास से पूर्व जन्मों के पाप कटते हैं और साधक आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर होता है।
कल्पवास का धार्मिक महत्व
हिंदू धर्मग्रंथों, विशेष रूप से पद्म पुराण और मत्स्य पुराण में कल्पवास की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। मान्यता है कि माघ मास में सभी देवी-देवता संगम क्षेत्र में वास करते हैं। इस दौरान संगम स्नान और पूजा-अर्चना करने से साधक को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। कल्पवास को केवल नदी किनारे रहना नहीं माना गया है, बल्कि यह मन, शरीर और आत्मा तीनों की शुद्धि की साधना है। सात्विक जीवन, संयम और नियमित गंगा स्नान से व्यक्ति के भीतर सकारात्मक परिवर्तन आता है। धार्मिक विश्वास यह भी है कि विधिपूर्वक कल्पवास पूर्ण करने वाले साधक को जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
कल्पवास के नियम
कल्पवास के दौरान जीवन पूरी तरह संयम और सादगी पर आधारित होता है। कल्पवासी दिन में केवल एक बार सात्विक या फलाहार ग्रहण करते हैं। प्रतिदिन प्रातः, मध्यान्ह और संध्या समय संगम या गंगा स्नान कर पूजा-पाठ करना आवश्यक माना जाता है। इस अवधि में पलंग या बिस्तर का त्याग कर जमीन पर पुआल या साधारण चटाई पर शयन किया जाता है। कल्पवासी झूठ, क्रोध, निंदा और भोग-विलास से दूर रहते हैं तथा अपने तंबू में अखंड दीप जलाकर प्रवचन, सत्संग और भजन-कीर्तन में समय बिताते हैं। यही कठोर नियम कल्पवास को एक गहन आध्यात्मिक साधना बनाते हैं।