
महर्षि वाल्मीकि को आदिकवि कहा जाता है। आदिकवि शब्द 'आदि' और 'कवि' के मेल से बना है। 'आदि' का अर्थ होता है 'प्रथम' और 'कवि' का अर्थ होता है 'काव्य का रचयिता'। वाल्मीकि ऋषि ने संस्कृत के प्रथम महाकाव्य रामायण की रचना की थी। यही कारण है कि महर्षि वाल्मीकि आदिकवि कहलाए। मनुस्मृति के अनुसार प्रचेता, वशिष्ठ, नारद, पुलस्त्य आदि भी इन्हीं के भाई थे। वाल्मीकि रामायण में स्वयं वाल्मीकि कहते हैं कि वे प्रचेता के पुत्र हैं। मनुस्मृति में आदिकवि महर्षि वाल्मीकि जी को वशिष्ठ , नारद , पुलस्त्य आदि का भाई बताया गया है। बताया जाता है कि वाल्मीकि का एक नाम वरुण भी है और वरुण ब्रह्माजी के पुत्र थे। यह भी माना जाता है कि वाल्मीकि वरुण अर्थात् प्रचेता के 10वें पुत्र थे और उन दिनों के प्रचलन के अनुसार उनके भी दो नाम 'अग्निशर्मा' एवं 'रत्नाकर' थे।
किंवदंती है कि महर्षि वाल्मीकि का जन्म नागा प्रजाति में हुआ। उन दिनों यह प्रजाति ज्यादा समृद्ध नहीं थी। हमें चाहिए हम किसी भी धर्म, जाति में जन्में हों लेकिन हमें इन्हें लेकर आत्मविश्वास नहीं खोना चाहिए।
रामायण के रचियता महर्षि वाल्मीकि पहले दस्यु यानी डाकू थे। नारद जी के संपर्क में आकर ज्ञानवान ऋषि, ठीक वैसे ही हम पहले क्या थे उसे भूलकर, अच्छे लोगों के सानिध्य में रहकर, अच्छे कर्म करते हुए महान बनने की राह में चलना चाहिए।
नारद मुनि ने जब वाल्मीकि जी से कहा, 'तुम जो पाप करते हो, इसका फल तुम्हें ही भोगना होगा। तब उन्हें दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई।' ठीक हमें भी अपने कर्म अच्छे करते रहना चाहिए। किसी भी तरह का व्यभिचार और पाप से हमेशा बचना चाहिए।
वाल्मीकि जी ने रत्नाकर वन में कई वर्षों तक तप किया, उनके शरीर पर चीटिंयों ने अपना घर (बांबी) भी बना लिया। ऐसी कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने अपने हौसले को गिरने नहीं दिया। हमें भी उनकी इस सीख से प्रेरणा लेते हुए। कैसी भी विषम परिस्थितियां आएं हमेशा अपनी बुद्धि और विवेक से सामना करना चाहिए।
महर्षि वाल्मीकि ने श्रीराम के जीवन पर आधारित पवित्र संस्कृत महाकाव्य रामायण लिखी है। जो इनकी कालजयी कृति है। यानी हमें भी अपने जीवन में कुछ ऐसा करना चाहिए कि वो काम हमारा कालजयी बन जाए।