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Mahashivratri 2026: कैसे हुआ शिव-शक्ति का महामिलन...? पढ़िए सती के वियोग से पार्वती विवाह तक की संपूर्ण कहानी

Mahashivratri 2026: महाशिवरात्रि केवल व्रत या पर्व नहीं, बल्कि शिव और शक्ति के दिव्य मिलन (Divine Story of Shiva and Parvati) का प्रतीक है। पौराणिक मा...और पढ़ें

By Digital DeskEdited By: Akash Sharma
Publish Date: Mon, 02 Feb 2026 06:06:18 PM (IST)Updated Date: Mon, 02 Feb 2026 06:07:26 PM (IST)
Mahashivratri 2026: कैसे हुआ शिव-शक्ति का महामिलन...? पढ़िए सती के वियोग से पार्वती विवाह तक की संपूर्ण कहानी
Mahashivratri 2026: जानिए कैसे हुआ शिव-शक्ति का दिव्य विवाह और क्यों खास है यह रात्रि (AI Generated Image)

HighLights

  1. सती के वियोग से शिव हुए वैरागी
  2. पार्वती ने कठोर तप से शिव को पाया
  3. अपर्णा नाम पत्तों के त्याग से जुड़ा

धर्म डेस्क। महाशिवरात्रि का पर्व (Mahashivratri 2026) हिंदू धर्म में विशेष आध्यात्मिक (Hindu Mythology) महत्व रखता है। यह दिन केवल भगवान शिव की आराधना तक सीमित नहीं है, बल्कि शिव और शक्ति के पवित्र विवाह का उत्सव भी है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी को भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था। इस अवसर से जुड़ी कथा तपस्या, विश्वास और आत्मिक प्रेम की मिसाल मानी जाती है।

महाशिवरात्रि: शिव-शक्ति मिलन का पावन पर्व

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हिंदू धर्म में महाशिवरात्रि का पर्व अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह वही पावन तिथि है जब देवों के देव महादेव ने माता पार्वती को अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया था। यह विवाह केवल दो व्यक्तित्वों का नहीं, बल्कि चेतना और ऊर्जा के मिलन का प्रतीक है।


सती का वियोग और शिव का वैराग्य

देवी सती ने अपने पिता दक्ष द्वारा भगवान शिव के अपमान को सहन न कर पाने के कारण यज्ञ कुंड में आत्मदाह कर लिया था। सती के इस वियोग से भगवान शिव अत्यंत व्यथित हो गए और संसार से विरक्त होकर हिमालय में तपस्या और समाधि में लीन हो गए। उनके वैराग्य से सृष्टि का संतुलन बिगड़ने लगा, क्योंकि शक्ति के बिना सृजन संभव नहीं था।

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माता पार्वती का पुनर्जन्म

देवी सती ने ही पर्वतराज हिमालय के घर माता पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया। बचपन से ही पार्वती महादेव की उपासना में लीन रहीं। जैसे-जैसे वे बड़ी हुईं, उनका संकल्प और अधिक दृढ़ होता गया कि वे केवल भगवान शिव से ही विवाह करेंगी। नारद मुनि ने उन्हें बताया कि महादेव को प्राप्त करने का मार्ग कठिन तपस्या से होकर गुजरता है।

अपर्णा नाम के पीछे की कथा

माता पार्वती ने कठोर तपस्या का संकल्प लिया और हिमालय में तप करने लगीं। प्रारंभ में उन्होंने फल-फूल का सेवन किया, फिर केवल जल पर जीवित रहीं। कुछ समय तक सूखे पत्तों का सेवन भी किया, लेकिन बाद में उन्होंने पत्ते भी त्याग दिए। पत्तों का त्याग करने के कारण ही उन्हें ‘अपर्णा’ कहा गया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनकी परीक्षा लेने का निश्चय किया।

शिव की परीक्षा और पार्वती का अटूट विश्वास

भगवान शिव ने एक ब्राह्मण का रूप धारण कर माता पार्वती के समक्ष अपनी ही निंदा की। उन्होंने शिव को औघड़, श्मशानवासी और सर्पधारी बताकर उन्हें अयोग्य कहा। यह सुनकर माता पार्वती ने स्पष्ट कर दिया कि उनका प्रेम शिव के बाहरी स्वरूप से नहीं, बल्कि उनके आत्मतत्त्व से है। पार्वती की अटूट श्रद्धा देखकर भगवान शिव अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हुए।

महाशिवरात्रि पर संपन्न हुआ दिव्य विवाह

फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी को भगवान शिव बारात लेकर माता पार्वती के द्वार पहुंचे। इस अनोखी बारात में देवता, गंधर्व, भूत-प्रेत, नंदी और अन्य गण शामिल थे। इसी पावन तिथि को शिव-पार्वती का विवाह संपन्न हुआ, जिसे आज महाशिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है।

अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। नईदुनिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। नईदुनिया अंधविश्वास के खिलाफ है।