यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jun 01, 2015 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
मनुस्मृति की हमेशा स्मरण रखने वाली 7 बातें
मनुस्मृति हिन्दू धर्म का प्राचीन धर्मशास्त्र है। इसे मानव धर्म शास्त्र, मनुसंहिता आदि नामों से भी जाना जाता है।
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Publish Date: Mon, 01 Jun 2015 03:49:31 PM (IST)Updated Date: Thu, 04 Jun 2015 07:00:04 AM (IST)

मनुस्मृति हिन्दू धर्म का प्राचीन धर्मशास्त्र है। इसे मानव धर्म शास्त्र, मनुसंहिता आदि नामों से भी जाना जाता है। यह उपदेश के रूप में है जो मनु द्वारा ऋषियों को दिया गया था । मनुस्मृति वह धर्मशास्त्र है जिसकी मान्यता जगत विख्यात है। भारत में वेदों के बाद सबसे ज्यादा प्रचलन में 'मनुस्मृति' का ही है।
इसमें चारों वर्णों, चारों आश्रमों, सोलह संस्कारों तथा सृष्टि उत्पत्ति के अतिरिक्त राज्य की व्यवस्था, राजा के कर्तव्य, वैवाहिक जीवन आदि भांति-भांति के विवादों, सेना का प्रबन्ध आदि उन सभी विषयों पर परामर्श दिया गया है जो कि मनुष्य के जीवन में घटित होना सम्भव है।
- मनुस्मृति में पति पत्नी के कर्तव्य व्यवहार के बारे में विस्तृत रूप में बताया गया है। इसी प्राचीन धर्मशास्त्र के अनुसार विवाह योग्य कन्या का विवाह न करने वाले माता-पिता और विवाह के भाद्र ऋतु में अंतर संगम न करने वाला पति निंदनीय होता है।
- स्त्री को खेत के समान माना गया है और पुरुष को बीज के तुल्य, खेत और बीज के यानी स्त्री, पुरुष के मिलने से प्राणियों की उत्पत्ति होती है।
- अति उत्कृष्ठ, सुंदर रूप गुण वाला, उत्तम स्वभाव वाला कन्या के गुणों के योग्य वर के लिए वह कन्या यदि माता की छः पीढ़ी के भीतर भी हो तो विवाह कर देना चाहिए।
- चाहे कन्या मरने तक बिना विवाह के पिता के घर बैठी रहे लेकिन गुणहीन दुष्ट पुरुष के साथ विवाह कभी न करें।
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- जो पिता पुत्रहीन है वह कन्यादान के समय अपने दामाद से कहे, इस कन्या से जो पुत्र उत्पन्न होगा वह मेरा तर्पण आदि करने वाला होगा।
- अपनी आत्मा के समान ही पुत्र होता है और पुत्र जैसी ही पुत्री। उस आत्मा रूप पुत्री के होते हुए कोई अन्य उसके धन को किस प्रकार ले सकता है।