
बुधदेव, सोमदेव यानी चंद्रदेव के पुत्र हैं। सोमदेव ने गुरु पत्नी तारा का समागम किया था इसलिए वह एक भयानक क्षय रोग से पीड़ित हो गए। इससे समस्त लोकों में हाहाकार मच गया।
सोमदेव की इस दशा को देखते हुए ब्रह्माजी ने कहा कि, 'यह तुम्हारे पूर्व दुष्कर्मों का फल है। अब तुम्हें केवल भगवान शिव ही इस समस्या से उबार सकते हैं। इसके लिए भगवान शिव के महामृत्युंजय मंत्र यानी 'ऊं नमः शिवाय' का जप कर तुम्हें तप करना होगा।' यह जप, छः मास तक चला। छठवें मास में सोमदेव ने दस करोड़ बार जप किया।
जप के प्रभाव से भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्होंने सोमदेव से वर मांगने को कहा। सोमदेव ने कहा, 'जो कृत्य मैंने गुरु पत्नी तारा के साथ किया उस पाप कर्म से आप मुझे मुक्त करें।'
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भगवान शिव ने कहा, तुम्हारे पाप कर्म तो तुम्हें भोगने ही होंगे मैं इन्हें कम कर सकता हूं। इसलिए आज से तुम 15 दिन बढ़ोगे और 15 दिन घटते क्रम में रहोगे। यानी पृथ्वी पर तुम पूर्णिमा में पूरा रूप धारण करोगे और अमावस्या में तुम विलुप्त हो जाओगे।
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जहां पर सोमदेव ने भगवान शिव की आराधना की वह जगह सोमश्वर तीर्थ कहलाई। सोम का यश बढ़ाने के लिए भगवान सिव को उन्हीं के नाम पर सोमेश्वर भी कहा जाता है। मान्यता है कि सोमेश्वर तीर्थ में भगवान शिव की पूजा अर्चना करने से क्षय, कोढ़ और त्वचा संबंधित तमाम रोगों से छुटकारा मिलता है।