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टाइगर को भगवान मानते हैं MP के आदिवासी, जंगल में जाने से पहले होती है अनोखे मूर्ती की पूजा, जानें क्या है बाघदेव का सच

मध्य प्रदेश के आदिवासी जंगलों में जाने से पहले 'बाघदेव' की पूजा करते हैं, जिन्हें वे अपना बड़ा भाई और रक्षक मानते हैं।

By Akriti KumariEdited By: Akriti Kumari
Publish Date: Thu, 16 Jul 2026 11:01:47 AM (IST)Updated Date: Thu, 16 Jul 2026 11:01:47 AM (IST)
टाइगर को भगवान मानते हैं MP के आदिवासी, जंगल में जाने से पहले होती है अनोखे मूर्ती की पूजा, जानें क्या है बाघदेव का सच
मध्य प्रदेश के आदिवासी सदियों से चली आ रही इस धार्मिक परंपरा को अब तक फॉलो करते हैं। (सोर्स- AI जनरेटेड)

HighLights

  1. मध्य प्रदेश के गोंड और बैगा आदिवासी बाघ को 'बाघदेव' और 'बड़ा भाई' मानते हैं
  2. जंगल के मुहाने पर बाघ की मूर्ती की विशेष पूजा की जाती है
  3. आदिवासी समुदाय में मान्यता है कि बाघ कभी बिना वजह हमला नहीं करता

धर्म डेस्क, मध्यप्रदेश। मध्य प्रदेश को देश का ‘टाइगर स्टेट’ कहा जाता है। यहां सबसे ज्यादा बाघ पाए जाते हैं। लेकिन इन बाघों से जुड़ी एक ऐसी परंपरा भी है, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। पेंच, कान्हा, बांधवगढ़, सतपुड़ा और अन्य जंगलों के आसपास रहने वाले गोंड, बैगा, कोरकू और भील जैसे आदिवासी समुदाय बाघ को केवल एक जंगली जानवर नहीं, बल्कि ‘बाघदेव’ और अपना ‘बड़ा भाई’ मानते हैं।

इन समुदायों की मान्यता है कि यदि जंगल के राजा का सम्मान किया जाए, तो वह कभी नुकसान नहीं पहुंचाता। यही आस्था आज इंसान और वन्यजीवों के बीच सह-अस्तित्व (Co-existence) की अनोखी मिसाल बन गई है।

कौन हैं ‘बाघदेव’?

आदिवासी समाज में बाघदेव सबसे पूजनीय लोक देवताओं में शामिल हैं। अलग-अलग इलाकों में उन्हें बाघेश्वर, वाघदेव या बगई ठाकुर के नाम से भी जाना जाता है।

इनके लिए बड़े मंदिर नहीं बनाए जाते। जंगल के किनारे किसी पुराने महुआ, साजा या अन्य पेड़ के नीचे मिट्टी का छोटा चबूतरा बनाया जाता है। इसी स्थान पर पत्थर या लकड़ी से बनी बाघ की आकृति स्थापित की जाती है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘थान’ कहा जाता है।


कैसे होती है बाघदेव की पूजा

आदिवासी बाघदेव की पूजा डर के कारण नहीं करते। उनका विश्वास है कि बाघ जंगल का असली रक्षक है। अगर जंगल सुरक्षित रहेगा तो पानी, पेड़-पौधे, जानवर और इंसानों का जीवन भी सुरक्षित रहेगा। इसी कारण जंगल में प्रवेश करने से पहले लोग बाघदेव के थान पर माथा टेकते हैं और सुरक्षित लौटने की प्रार्थना करते हैं।

क्यों कहते हैं बाघ को ‘बड़ा भाई’?

बैगा और गोंड समुदाय की लोक मान्यताओं में बाघ को परिवार के बड़े सदस्य जैसा सम्मान दिया जाता है। उनका मानना है कि बाघ बिना वजह इंसान पर हमला नहीं करता। यदि कोई हमला होता भी है, तो उसके पीछे प्रकृति का कोई कारण होता है। जैसे जंगल के नियम तोड़ना, जरूरत से ज्यादा शिकार करना या पवित्र स्थानों को नुकसान पहुंचाना। वे इसे ‘कुदरत का इंसाफ’ मानते हैं।

जंगल जाने से पहले निभाई जाती है यह परंपरा

महुआ बीनने, लकड़ियां इकट्ठा करने या जंगल से अन्य जरूरी संसाधन लेने जाने से पहले ग्रामीण बाघदेव के थान पर फूल, नारियल या अन्य श्रद्धा सामग्री चढ़ाते हैं। वे प्रार्थना करते हैं कि जंगल में उनका रास्ता सुरक्षित रहे और बाघदेव उनकी रक्षा करें। कई इलाकों में मनोकामना पूरी होने पर लोग मिट्टी से बने छोटे बाघ या घोड़े भी चढ़ाते हैं।

जंगल और इंसान के रिश्ते का अनोखा उदाहरण

स्थानीय बैगा गुनिया (पारंपरिक वैद्य) और आदिवासी फॉरेस्ट गार्ड बताते हैं कि पीढ़ियों से उनका समुदाय बाघों के साथ जंगल साझा करता आया है। उनके अनुसार, यह रिश्ता भय नहीं, बल्कि सम्मान और संतुलन पर आधारित है। रात में जंगल में गश्त के दौरान भी कई वनकर्मी बाघदेव का स्मरण कर खुद को मानसिक रूप से मजबूत महसूस करते हैं।

क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?

वाइल्डलाइफ एक्सपर्ट्स के अनुसार, भारत के कई आदिवासी समुदायों में बाघ को लेकर ऐसी सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताएं लंबे समय से मौजूद हैं। हालांकि, यह मान्यता कि बाघ कभी बिना कारण हमला नहीं करता, लोकविश्वास का हिस्सा है। वास्तविकता यह है कि बाघ का व्यवहार कई परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इस वजह से वन विभाग हमेशा जंगल में सावधानी बरतने की सलाह देता है।