
-ज्योतिषाचार्य पं. विनोद चौबे
सिद्घान्तशेखर नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि लिंग पांच तरह के होते हैं। ये हैं-स्वयंभू ( स्वत: प्रकट होना, अमरनाथ आदि) ,देवपालित (केदारनाथ आदि), ऋषि कृत यानी अवतार महापुरुष ऋषि मुनि द्वारा पूजित (रामेश्वरम् आदि), शिलादिज (पत्थर से बनाए या खुद ब खुद बने नर्मदेश्वर आदि) और मानस (श्रद्घा और समयानुसार तत्काल बनाकर पूजित मिट्टी यीनी पार्थिव पूजा )। स्वयंभू लिंग के दर्शन भर से ही सब पापों का नाश होना बताया गया है!
दृष्ट्वा लिंगं महेशस्य स्वयंभू तस्य पार्वति। सर्वपापविनिर्मुक्त: परे ब्रह्माणि लीयते॥
इस दृष्टि से बाबा अमरनाथ स्वयंभू लिंग होने से परम पूज्य हो जाते हैं। स्वयंभू भी दो तरह के होते हैं । पहला एक बार प्रकट होकर सदा बने रहना और दूसरा समयानुसार प्रकट होना।
काशी के रामनगर और सोनारपुरा मुहल्ले के मध्य स्थित एक मंदिर में विशालकाय शिवलिंग है । यह तकरीबन 7 से 8 फीट ऊंचा और काफी बड़े व्यास में स्वयंभू शिवलिंग है, जिन्हें तिलभाण्डेश्वर महादेव के रुप में जाना जाता है । शिवलिंग हर वर्ष सावन माह में तिल मात्र बढ़ता रहता है।
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भारत ही नहीं अपितु अन्य देशों में शिव के अलग-अलग विग्रह को आश्चर्यजनक रुप में सहज ही दर्शन किया जा सकता है। लिंग या देव विग्रह के तौर पर जाने जाते हैं। इनमें भी केवल सावन के महीने में ही क्रमश: बन वाले अथवा बढऩे वाले या फिर स्वयं ही विलीन होने वाले बाबा अमरनाथ का स्थान महत्त्वपूर्ण है।
बाबा अमरनाथ जहां एक ओर सृष्टि की अमरता का दर्शन कराते हैं वहीं दूसरी ओर लय और प्रलय तथा सृष्टि विन्यास का आत्मबोध भी कराते हैं। कुल मिलाकर बाबा अमरनाथ की यात्रा मंगलकारी तो है ही। साथ ही यह यात्रा मनुष्य को आत्मबोध कराकर सांसारिक मोहमाया से मुक्त होने का मार्ग भी प्रशस्त कराती है।