- मनीष मेहता

हमारे पुराणों में वर्णन है कि संसार में नर्मदा ही एकमात्र नदी है जिसकी परिक्रमा सिद्ध, नाग, यक्ष, गंधर्व, किन्नर, मावन आदि करते हैं। माघ शुक्ल सप्तमी पर अमरकंटक से लेकर खंभात की खाड़ी तक नर्मदा के किनारे पड़ने वाले ग्रामों और नगरों में उत्सव रहता है क्योंकि इस दिन नर्मदा जयंती मनाई जाती है। नर्मदा अनादिकाल से ही सच्चिदानंदमयी, आनंदमयी और कल्यायणमयी नदी रही है। हमारे कई प्राचीन ग्रंथों में नर्मदा के महत्व का वर्णन मिलता है। नर्मदा शब्द ही मंत्र है। नर्मदा कलियुग में अमृत धारा है। नर्मदा के किनारे तपस्वियों की साधना स्थली भी हैं और इसी कारण इसे तपोमयी भी कहा गया है।

अगस्त्य, भृगु, अत्री, भारद्वाज, कौशिक, मार्कण्डेय, शांडिल्य, कपिल आदि ऋषियों ने नर्मदा तट पर तपस्या की है। ओंकारेश्वर में नर्मदा के तट पर ही आदि शंकराचार्य ने शिक्षा पाई और नर्मदाष्टक की रचना की। भगवान शंकर ने स्वयं नर्मदा को दक्षिण की गंगा होने का वरदान दिया था।

पुराणों के अनुसार नर्मदा का उद्भव भगवान शंकर से हुआ। तांडव करते हुए शिव के शरीर से पसीना बह निकला। उससे एक बालिका का जन्म हुआ जो नर्मदा कहलाई। शिव ने उसे लोककल्याण के लिए बहते रहने को कहा। कहते हैं कि वैशाख शुक्ल सप्तमी पर नर्मदा में गंगा का वास रहता है। विष्णु पुराण में वर्णन आता है कि नाग राजाओं ने मिलकर नर्मदा को वरदान दिया है कि जो व्यक्ति तेरे जल का स्मरण करेगा उसे कभी सर्प विष नहीं व्यापेगा।

चाणक्य ने भी नर्मदा तट पर भड़ौच के पास शुल्क तीर्थ में सिद्धि पाई थी और महेश्वर मंडन मिश्र की पत्नी भारती की अध्यक्षता में शंकराचार्य और मंडन मिश्र के बीच शास्त्रार्थ हुआ था। कालिदास ने नर्मदा को 'रेवा" कहकर पुकारा है। शंकर नर्मदामय हैं और नर्मदा शंकरमय। एक नर्मदेश्वर कहलाते हैं तो दूसरी शांकरी। इसलिए परिक्रमावासी कहते हैं नर्मदे हर।

नर्मदा के सभी स्थलों को श्राद्ध के लिए उपयुक्त बतलाया गया है। वायुपुराण में उसे पितरों की पुत्री बताया गया है और इसके तट पर किए गए श्राद्ध का फल अक्षय बताया गया है। नर्मदा पत्थर को भी देवत्व प्रदान करती है और पत्थर के भीतर आत्मा प्रतिष्ठित करती है।

नर्मदा के सामीप्य का सुख पाने वालों के लिए वह मात्र एक नदी नहीं है बल्कि मां है, नर्मदा मैया। हमारे हर सुख, दुख और आपदा में नर्मदा की पारिवारिक भागीदारी है। भारत में चार नदियों को अत्यधिक पवित्र माना गया है। गंगा, यमुना, सरस्वती और नर्मदा। गंगा को ऋग्वेद, यमुना को यजुर्वेद, सरस्वती को अथर्ववेद और नर्मदा को सामवेद का रूप माना जाता है। यह इस दृष्टि से भी उपयुक्त लगता है कि नर्मदा सागर तक की यात्रा गुनगुनाते हुए या रव करते हुए कहती है। वह अपना एक संगीत भी रचती है।

नर्मदा की उपत्यका में धर्म, अध्यात्म, दर्शन, विज्ञान एवं संस्कृति पनपी। स्वामी शंकराचार्य संपूर्ण नर्मदा तट को संपूर्ण तीर्थ यज्ञों में शीर्ष स्थान प्रदान करते हुए धर्म, संस्कृति और प्रकृति का सहज समन्वय बताया है। नर्मदा के उभयतट पर स्नान, दान, जप, तप ही नहीं दर्शन मात्र से अनन्य पुण्य की प्राप्ति होती है। मार्कण्डेय के अनुसार प्रलय के बाद केवल नर्मदा ही जीवित रहती है। देव, गंधर्व, ऋषि सभी नर्मदा के तट पर ही तप करते हैं। प्राचीन काल में 33 कोटि देवी-देवताओं, ऋषि-मुनियों, किन्न्रों, गंधर्वों, नागों ने नर्मदा परिक्रमा की। नर्मदा कलिकाल में नर्मदा, शर्मदा, धर्मदा और कर्मदा है जिसमें ज्ञान भक्ति और कर्मयोग सम्मिलित है। आज भी संपूर्ण नर्मदा घाटी में नर्मदे हर और ओम नम: शिवाय के स्वर गूंजते रहते हैं।

नर्मदा का हर कंकर है शंकर

विश्व में हर शिव मंदिर में नर्मदा से निकले शिवलिंग ही शोभायमान हैं। कुछ श्रद्धालु अन्य पाषाण से निर्मित शिवलिंग की स्थापना भी करते हैं किंतु ऐसे शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा अनिवार्य है जबकि नर्मदा से निकले शिवलिंग बिना प्राण प्रतिष्ठा के ही पूजित हैं। विद्वान कहते हैं कि गंगा में विवेक ज्यादा है और भावुकता कम। यमुना में भावुकता ज्यादा है और विवेक कम। नर्मदा में विवेक और भावुकता का सही तालमेल है। यही कारण है कि मां नर्मदा के तट पर उत्तर के आर्यों की विचार प्रधान संस्कृति और दक्षिण के द्रविड़ों की आचार-प्रधान संस्कृति का समन्वय हुआ।

माघ माह की शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को नर्मदा जयंती के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त है। नर्मदा जीवनदायिनी मां है। यह पूरी दुनिया की अकेली रहस्यमयी नदी है। चारों वेद इसकी महिमा का गान करते हैं। कहते हैं कि कृपा सागर भगवान शंकर द्वारा अमरकंटक के मैकल पर्वत पर 12 वर्ष की कन्या के रूप में नर्मदा को उत्पन्ना किया गया। नर्मदा ने भगवान शिव से वरदान प्राप्त किया था कि 'प्रलय में भी उसका नाश न हो। उसका हर पाषाण शिवलिंग के रूप में बिना प्राण-प्रतिष्ठा के पूजित हो।'

विश्व में हर शिव मंदिर में नर्मदा से निकले शिवलिंग ही शोभायमान हैं। कुछ श्रद्धालु अन्य पाषाण से निर्मित शिवलिंग की स्थापना भी करते हैं किंतु ऐसे शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा अनिवार्य है जबकि नर्मदा से निकले शिवलिंग बिना प्राण प्रतिष्ठा के ही पूजित हैं। विद्वान कहते हैं कि गंगा में विवेक ज्यादा है और भावुकता कम। यमुना में भावुकता ज्यादा है और विवेक कम। नर्मदा में विवेक और भावुकता का सही तालमेल है। यही कारण है कि मां नर्मदा के तट पर उत्तर के आर्यों की विचार प्रधान संस्कृति और दक्षिण के द्रविड़ों की आचार-प्रधान संस्कृति का समन्वय हुआ। महर्षि मार्कण्डेय के अनुसार इसके दोनों तटों पर साठ लाख साठ हजार तीर्थ हैं एवं इसका कंकर-कंकर शंकर रूप है।

पद्मपुराण में वर्णन है-

'पुण्या कनखले गंगा, कुरुक्षेत्रे सरस्वती।

ग्रामे वा यदि वारण्ये, पुण्या सर्वत्र नर्मदा।।'

अर्थात गंगा कनखल (हरिद्धार) में पुण्य प्रदायिनी है, सरस्वती कुरुक्षेत्र में, किंतु नर्मदा कोई भी ग्राम हो या फिर जंगल सर्वत्र ही पुण्य प्रदान करने वाली है।

नर्मदा किनारे कई तीर्थ

तीर्थाटन की दृष्टि से भी नर्मदा अन्य नदियों की तुलना में श्रेष्ठ है। अमरकंटक से सागर संगम तक इसके किनारे दस करोड़ तीर्थ हैं। पुराणों में विभिन्ना स्थानों पर वर्णन है कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सूतमुनि मार्कण्डेय इत्यादि ने नर्मदा की लोकोत्तर महिमा का बखान किया है। भगवान विष्णु ने उसे

मृत्युलोक की वैतरणी कहा है तथा ब्रह्मा ने संसार की पाप नाशिनी नदी कहकर संबोधित किया है।

अकेली नदी जिसकी परिक्रमा

पुराणों में एक सुंदर कहानी है। उसके अनुसार नर्मदा और सोन (यानी शोणभद्र, जिसे नद माना है) का विवाह होने वाला था। पर शोण नर्मदा की दासी जुहिला पर ही आसक्त हो बैठा, तो नर्मदा नाराज हो गई। कभी विवाह न करने के संकल्प के साथ पश्चिम की ओर चल दी। लज्जित और निराश शोण पूर्व की ओर गया। नर्मदा चिरकुमारी कहलाई। इसलिए श्रद्धालु नर्मदा को अत्यंत पवित्र नदी मानते हैं और उसकी परिक्रमा करते हैं। भारत में नर्मदा अकेली ऐसी नदी है जिसकी परिक्रमा की जाती है। यह परिक्रमा भिक्षा मांगते हुए नंगे पैर करना पड़ती है और नियमानुसार करने पर इसमें 3 वर्ष, 3 महीने और 13 दिन लगते हैं। पुरुषों के साथ स्त्रियां भी यह कठिन परिक्रमा करती हैं। नर्मदा की यह परिक्रमा प्रकृति के सौंदर्य से भी रूबरू करवाती है।

नर्मदा के दर्शन मात्र से सौभाग्य

नर्मदा भारत की सात प्रमुख नदियों में गिनी जाती है। गंगा के बाद नर्मदा का ही महत्व है। पुराणों में नर्मदा पर जितना लिखा गया है उतना और किसी नदी पर नहीं। स्कन्दपुराण का रेवा-खंड तो पूरा नर्मदा पर ही केंद्रित है। पुराणों में वर्णित है कि जो पुण्य गंगा में स्नान करने से मिलता है, वह नर्मदा के दर्शन मात्र से प्राप्त होता है।

तौलकर पूजें नर्मदा के कंकर

विद्धान कहते हैं कि नर्मदा से बाणलिंग प्राप्त करने के उपरांत पहले उसकी ग्राह्ता की परीक्षा करें। सर्वप्रथम बाणलिंग को चावल से ठीक ढंग से तौलें। फिर उसे दुबारा तौलें। दुबारा तौलने पर अगर बाणलिंग का वजन हल्का निकले तो वह गृहस्थों के लिए पूजनीय होगा। कई बार तौलने पर भी यदि वजन बिलकुल बराबर निकले तो उसको फिर से नर्मदाजी में विसर्जित कर दें। यदि बाणलिंग दुबारा तौलने पर भारी निकले तो वह उदासीनों के लिए उपयुक्त होगा। तौल में कमी-बेशी ही बाणलिंग की प्रमुख पहचान है। नर्मदा के नर्मदेश्वर भक्तों के परम आराध्य हैं।